माता पिता की लाशों पर घर बनाया

कई लोगों ने माता-पिता, भाई-बहन की छाती को रौंदकर, उनकी लाशों पर चलकर अपने मकान बनाये है 

एक घर में पिता गुज़र गये। माता रह गयी। माता ने 8 हज़ार की नौकरी कर ली। वह बच्चों को पाल रही थी। बच्चे बडे हुए। बच्चों ने कमाना शुरू किया तो वे माता को एक भी पैसा नहीं देते थे। बडा बेटा एक भी पैसा नहीं देता था तो छोटे ने कहा कि बडा नहीं देता है तो मैं क्‌यों दूँ? बडा बेटा कहता था कि माता मुझे तन™वाह नहीं मिलती मैं अभी ट्रेिनग पर हूँ न, तीन साल तो ट्रेqनग में ही बिना तन™वाह के निकल जाएँगे। छोटे ने कहा मेरे व्यापार में नुकसान हो रहा है। मैं उस नुकसान को बहुत ही मुशि्कल से कवर कर पा रहा हूँ, तुमसे ही तो उल्‌टे एक-एक हज़ार लेकर लोगों को नुकसान भर रहा हूँ।

लेकिन दोनों बेटे अंदर ही अंदर पैसा जमा कर रहे थे। माता इसी मुसीबत में थी कि कमाई नहीं है तो मेरा क्या होगा, बच्चों का क्या होगा, माता कहते-कहते एक दिन बेचारी मर गयी। मगर इन बेटों की जेब से पैसा तक नहीं निकला, माता की मæयत का खर्च भी भाइयों ने एकदम बराबरी में बाँटा। सो, इस तरह से माता की लाश को रौंद कर माता की छाती को कुचल-कुचलकर बेटों ने अपने घर बसाये हैं। आज दोनों बेटों के एक-एक करोड के मकान हैं, दोनों शान से रहते हैं। माता की बडी फोटो लगी है घर में। उसके संघष© के गुण भी गाते हैं, लेकिन जब माता को पैसे का सहारा देना था, उसकी qज़दगी को बढाना था, तब तो उसे लाचार कर डाला था। बेचारी माँ तो बच्चों को जान से लगाकर रखना चाहती थी, उनके लिए रोज़ाना चुडवा-चबीना लाती थी, अपने पेट से जन्में बच्चों को जी-जान से चाहती थी, क्या मिला बेचारी माँ को, उल्‌टे तडप-तडपकर मौत मिल गयी। ठीक है, हम नहीं कहते कि घर मत बनाइये, ज़रूर बनाइये, लेकिन इतनी मेहनत कीजिए कि आप भी चलते रहें, घर भी चलता रहे, समाज की भी आप मदद करते रहें। सबकुछ होते रहना चाहिए।



लोग वत©मान को कुचलकर भविष्‌य के सपने देखते हैं, अपने रिश्तेदार को तडपाते हैं, उसकी समय पर मदद नहीं करते, भाई माँगने आता है 10 हज़ार तो नहीं देते, अगले ही घंटे 3 लाख की ज़मीन लेने को तैयार हो जाते हैं। पैसा दबाकर इतना रखा हुआ है कि सबकुछ किया जा सकता है लेकिन भाई-बहन का नाम आते ही उनके शरीर पर साँप लोटने लग जाते हैं। कहते हैं भाई कुत्ता है, बहन एक नंबर की लालची है।
दुनिया में जितने भी लोगों ने अपना मकान बनाया है, उसमें से आधे मकान तो रिश्तेदारों की छाती को कुचलकर या रिश्तेदारों की लाशों को रौंदकर बनाये गये हैं। लोग अपने चाचा-मामा-माता-पिता-भाई-बहन को मरता हुआ या उन्हें मुसीबत में छोड देते हैं लेकिन अपना मकान बना लिया करते हैं। ये लोग अंदर ही अंदर अपने को गुनाहगार या अपराधी मानते हैं लेकिन उस बात को दबा देते हैं और ऊपर से घमंड बताकर रिश्तेदारों को चिढाने लग जाते हैं। अपने ही लोगों का खून जलाया करते हैं।
भाई मुसीबत में है भई हम क्या करें, मरे साला, मैं तो मकान बनाता हूँ। पिता के इलाज को पैसा नहीं लगाते हैं, उम्र हो गयी है, मरने ही वाले हैं, मैं तो मकान बना लेता हूँ। अपना मकान बनाने वाला बहुत सारी ज़िम्मेदारियों से भागने लगता है। दरअसल, मकान बनाने वाला समाज के लिए कुछ कर ही नहीं पाता है। मकान बनाकर उसका पैसा चुकता करने में उसके 45 साल निकल जाते हैं। उसके बाद बच्चों की पढाई का खर्च। उसके बाद बच्चों की शादी। सो, जीवन के 55 साल वह केवल अपने लिए ही जीता है। उसके बाद 60 साल में छाती निकालकर समाज के सामने आता है और रिश्तेदारों में 5-10-15-50 हज़ार रुपये की मदद कर दिया करता है। वह पैसा भी बैंक में जमा पैसे का ब्याज ही होता है और कुछ नहीं। हम कहते हैं कि जिस दिन से किसी को भी नौकरी लगती है उसी दिन से उसे सारे परिवार की कहीं न कहीं मदद करनी शुरू कर देनी चाहिए। अपने 22 साल की उम्र से सभी का खयाल रखना चाहिए। न कि 60 के बाद मदद करना चाहिए। क्‌योंकि आपने 22 से लेकर 60 साल तक किसी की मदद नहीं की तो उतने वषा] में न जाने कितने लोग पैसे की कमी के कारण मरते चले जाते हैं हम उनकी तरफ देखते भी नहीं हैं



एक घर का बडा बेटा दिल्ली में नौकरी करता था, इधर मुंबई में उसके भाई को 20 लाख का कर्ज़ हो गया था। सारे कर्ज़ के लोग दिन रात भाई को सताते थे। बडे भाई ने अपनी 30 साल की उम्र में सोचा कि छोटे के साथ ठहरना चाहिए। दिल्ली में उस भाई की 20 हज़ार तन™वाह थी, उसने नौकरी को लात मारी, सोचा कि मेरा भाई अगर कर्ज़ के बोझ से मर गया तो उसकी बीवी और छोटी-छोटी दो ब{ƒयों का क्या होगा? वह इसके शहर आया। उसने छोटे भाई के कर्ज़दारों को सँभाला। इतना ही नहीं, उसने अपने पिता के साथ मिलकर पैसा कमाया और सबसे पहले कर्ज़दार भाई की दोनों ब{ƒयों की पढाई नहीं रुकवायी। आज वह दोनों ब{ƒयों की कमाई महीने की एक लाख हो चुकी है। सो, अपना जीवन बबा©द करके दूसरों का जीवन आबाद करना यही होता है जीवन का रस, इसी रस में आनंद भी आता है। जीवन में कुछ किया है, ऐसा गव© भी होता है।
इधर एक बहन ने रोते हुए अपने भाई को फोन से कहा कि मुझे 25 हज़ार रुपये दे दीजिए, मेरी qज़दगी और मौत का सवाल है। मेरा ससुराल संकट में है, भाई ने उसका जवाब एक साल तक नहीं दिया। बहन तडप गयी, उसे बीपी-शुगर हो गया। इधर भाई ने छह महीने बाद ही अपने 18 लाख के फ्‌लैट का गृह-प्रवेश किया। करीब 400 लोगों को बुलाया, बहन को दावत तक नहीं दी। उधर बहन ने भी कमर कस ली, आज बहन का दिल, भाई के लिए नहीं तडपता।
ये जो लोग मकान जल्‌दी बना देते हैं। वे बाद में तनकर समाज में निकलते हैं और दूसरों पर हँसा करते हैं कि उसने जीवन में किया ही क्या है? वे उपदेश देते हैं कि जीवन में हमने बहुत ही सिस्टमे{टक तरीके से योजना बनायी। पहले ज़मीन ली। ज़मीन का कर्ज़ फेडा, मकान बनाया, उसका कर्ज़ फेडा। इसी में हमारे 15 साल निकल गये। यानी से 30 साल से 45 साल निकल गये। हम बहुत खुश हैं। हमारे मकान की कीमत आज बाज़ार में एक करोड रुपये है। आपने क्या किया? समाज, समाज करते रह गये। कोई काम नहीं आया। बहन की मदद की, भाइयों की मदद की, माता-पिता पर पैसा लुटाया, चाचा, मामा, बुआ, को बैठाकर खिलाया, क्या मिला आपको? आज बैठे रह गये हाथ मलते हुए,क्या मिला आपको? लेकिन भगवान की कृपा देखिए कि अचानक उसके बेटे को एक लाख की नौकरी मिल गयी। उसने भी बहुत बडा फ्‌लैट बुक कराया। सो, जो लोग समाज के लिए बहुत कुछ करते हैं उनका घर बनने में देर होती है, लेकिन पूरी तरह से अँधेर नहीं होता है। यह तो रही शुरूआती संघषा] की कहानी।
अब तो पैसे की तो सरासर हैवानियत हो चली है। इस हैवानियत को देखकर जो संघष© करने वाले गरीब रिश्तेदार हैं उनका खून बुरी तरह से जल रहा है। वे लोग आत्महत्या तक करने को तैयार हो रहे हैं। उनको अपने ही रिश्तेदार इतना जला रहे हैं कि उनको कई तरह की बीमारियाँ लिपट रही है। एक चचेरा भाई 8 लाख की कार ले रहा है, तो दूसरा भाई बेचारा टçूशन पढाकर पैसा कमा रहा है। अमीर भाई गरीब भाई को बहुत ही नीची नज़र से देख रहा है। उसका अपमान कर रहा है। एक ममेरे भाई ने बहुत बडी कंपनी बना ली। उसने अपनी कंपनी में दो तरह के पेशाबखाने रखे, एक नौकरों का पेशाब खाना, एक खुद का यानी एक्‌ज़ीक्‌यू{टव पेशाबखाना। एक दिन उसका गरीब ममेरा भाई आया, उसे पेशाब लगी, उसने सोचा मैं तो ममेरा भाई हूँ, यानी कंपनी के मालिक का रिश्तेदार हूँ। मैं तो मेरे ममेरे भाई के ही एक्‌ज़ीक्‌यू{टव पेशाबखाने में ही पेशाब करने जाऊँगा। वह गया। बाहर आया तो उसका अमीर ममेरा भाई सामने ही खडा था, उसने अपने ममेरे भाई को ऊपर से नीचे तक हिकारत-नफरत की नज़र से देखा कि साले की औकात नहीं है अमीरों के पेशाबखाने में पेशाब करने की।  गरीब भाई ने पूछा कि क्या भाई आप मुझे नफरत की नज़र से क्‌यों देख रहे हैं, क्या आपका टॉइलेट इस्तेमाल करना बडा पाप हो गया है क्या?नहीं, नहीं, आपने फ्‌लश तो ठीक से दबाया न। साबुन से हाथ तो धोया न। हाँ, हाँ, सबकुछ किया है। फिर उस बेचारे गरीब भाई ने घमंडी भाई के कंधे पर हाथ रखकर कहा कि मेरी माता और तुम्हारे भाई एक ही थाली में भोजन करते थे, ऐसा कहते हुए वह बहुत हँसता हुआ आगे बढ गया। सच कहा उसने, एक ही थाली में पहले सारे भाई-बहन भोजन किया करते थे। कितना सुंदर था वो ज़माना।
एक भाई ने 45 लाख का मकान लिया। उसने अपने दोस्त को फोन करके कहा कि मैंने 45 लाख का मकान लिया है। दोस्त ने कहा मैं अभी मिठाई लेकर आपके घर आ रहा हूँ। उतने में इस भाई की सगी बहन, भाई के घर आयी। भाई ने एक ही पेट से जन्मी सगी बहन को नहीं बताया कि उसने 45 लाख का मकान लिया है। बहन आयी तो भाभी ने रोना, रोना शुरू कर दिया, दूसरे कमरे में ले जाकर भाभी ने ननद से कहा कि हमको अभी बहुत सारे खर्च हैं, बच्चों की पढाई के लिए 25 लाख रुपये की ज़रूरत है, रात भर मेरे पति यानी तुम्हारे भाई को नींद नहीं आ रही है, क्या करें समझ में नहीं आ रहा है। बहन बेचारी भाई की समस्या को अपनी समस्या समझ रही थी, वह भी परेशान हो रही थी कि भाई रात में सोता नहीं है। बहन को क्या मालूम कि भाई ने तो 45 लाख का मकान ले लिया है। एडवांस में 27 लाख भर भी दिये हैं। उतने में भाई का दोस्त आया, उसने मिठाई का डिब्बा दिया, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा कि बधाई हो, बधाई हो, यार तुमने तो बहुत बडा सरप्राइज़ दे डाला। किसी ने सोचा तक नहीं था, आप इतने छुपे रुस्तम निकलेंगे। उतने में बहन बाहर जाने को डाइंगरूम में आयी, भाई डर गया, उसने बहन को बताया ही नहीं था। बहन ने दोस्त से पूछा ये मिठाई किस बात की है, दोस्त ने कहा आपके भाई ने 45 लाख का मकान लिया है। बहन को सुनते ही बीपी लो हो गया। ज़ुईईईईईई करके तेज़ चक्कर आया तो वह वहीं सोफे पर बैठ गयी। बेचारी अभी-अभी रो रही थी कि मेरा भाई परेशानी में है। इधर भाभी शान से ननद को देख रही थी कि देख, तुझे कैसा उल्लु बनाया हमने। वह चेहरे के भाव से बतला रही थी कि तेरी औकात ही क्या है, वह मन में सोच रही थी कि ननद ने अभी चार महीने पहले 8 लाख की कार लेकर हमें भी सरप्राइज़ दिया था। हमने भी 45 लाख का मकान लेकर उसके गाल पर ऐसा झन्नाटेदार तमाचा मारा है कि साली ननद के होश ही उड चुके हैं।
सच में, ननद के होश ही उड गये, वह जल्‌दी-जल्‌दी अपनी कार में गयी, वहाँ से अपने दूसरे दो भाइयों को फोन लगाकर यह बात बतायी तो उन दोनों की भी पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। यही हो रहा है, आजकल किसी की कोई मदद नहीं कर रहा है, बस अपनी प्रगति छिप-छिपकर कर रहे हैं। सारा जीवन जलते-जलते ही गुज़र रहा है। कोई किसी को जला रहा है तो कोई किसी को। हरकोई एक-दूसरे को जला रहा है।
पैसे का घमंड दिखाना सबसे बडी मुर्खता है। किसी को जलाना तो उससे भी बडी मुर्खता है। किसी की मदद नहीं करना तो सबसे बडी मुर्खता है। जीवन का आनंद तो इसी में है कि भरपेट भोजन, माता-पिता का साथ, भाई का साथ, बहन का साथ, पत्नी का साथ ससुराल से दहेज़ न लेकर सम्मान पाना, प्रेम करने में मज़ा और काम करने में मज़ा। यही है जीवन का असली रस। इन सबके बाद आते हैं मकान, कार, गहने, आदि-आदि। जो बेजान चीज़ें हैं उसपर हम जान लुटा रहे हैं, जो जीवित लोग हैं उनको हम एक कौडी भी नहीं दे रहे हैं। किसी-किसी के घर में दो-दो कुत्ते हैं, वो कुत्ते शान से रोज़ाना 60 रुपये का भोजन करते हैं, लेकिन उसका सगा भाई आकर नाश्ता-चाय करता है तो भाई को बहुत गुस्सा आता है कि साला फोकट का खाकर चला जाता है।
हम ऐसे समाज का निमा©ण करना चाहते हैं कि जहाँ पैसे का बँटवारा ठीक तरह से हो। जलन कम हो, सब मिल बाँटकर खाएँ। मुसीबत में काम आयें। एक-दूसरे को धोखा न दें। पैसे की धौंस न दिखाएँ। पैसे से बडा सुख होता है, सभी सुखी रहें।

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