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Showing posts from January, 2018

अभी तक तो भाई और बहन एक दूसरे का साथ नहीं दे रहे हैं

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अभी तक तो भाई और बहन एक दूसरे का साथ नहीं दे रहे हैं, लेकिन अब तो माता-पिता अपनी बेटी को भी नहीं निभा रहे हैं,जबकि माता-पिता के पास लाखों रुपया पड़ा रहता है आज सारी दुनिया में यही शोर चल रहा है कि दामाद बहुत ही ख़राब है, जल्लाद की तरह है, इसलिए हम अपनी ब्याहता बेटी की भी मदद नहीं करेंगे। दामाद का तो ऐसा होता है कि उसकी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं होती है फिर भी वह घमंड की बातें हमेशा किया करता है। ससुराल के सामने वह डींगे हाँकने लग जाता है, झूठ बोलता है, लेकिन वह ससुराल के सामने नहीं झुकता है। यह दामाद की असल में यही फितरत पहले से ही रही है, और रहेगी भी। लेकिन सभी को यह भी तो समझना चाहिए कि उसी दामाद के कब्जे में तो हमारी बेटी भी तो रहती है, बेटी चाहे तीस साल की हो जाय या पचास साल की, दामाद हमेशा बेटी के मायके को बुरी-बुरी गालियाँ दिया करता है। यह सब देखकर माता-पिता हमेशा के लिए बेटी को ही त्यागा कर रहे हैं उससे हमेशा के लिए जान छुडा रहे हैं, जो कि बहुत ही बुरी बात है, अपने ही पेट से जन्मी हुई बेटी को ही वे हमेशा के लिए दामाद के कब्जे में रख देते हैं, जिससे कि दामाद आपकी ही बेटी को पीटन…

मोदीजी आये हैं लेके दिल में इश्क मोहब्बत

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मोदीजी आये हैं लेके दिल में इश्क मोहब्बत, सबको गले लगाना अपने कल्चर की है आदत, स्वैग से करेंगे सबका स्वागत आमदनी अट्टनी ख़र्चा रुपय्या के हिसाब से आज भारत का हरेक नागरिक जी रहा है। कमाई धेले की नहीं है, ख़र्चा का अंबार लगा हुआ है। पिटते-पिटाते सब जी रहे हैं और मोदी सरकार की तरफ ललचायी नज़रों से देख रहे हैं और भजन गा रहे हैं, ओ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले....। पिंजरे के पंछी रे एएएए तेरा दर्द ना जाने कोई तेरा दर्द न जाने कोई....। इस जग की अजब तस्वीर देखी एक हँसता है दस रोते हैं....। दिमाग़ में पुराने पुराने गीत आ रहे हैं, कवि प्रदीप, के. एल. सहगल, मुकेश के गीत याद आ रहे हैं....दिल जलता है तो जलने दे आँसू न बहा फरियाद न कर, दिल जलता है तो जलने दे...।।

गहराई से सोचें तो हम लोग ही आमदनी अट्टनी ख़र्चा रुपया का जीवन जी रहे हैं, और सरकार को कोस रहे हैं। बच्चों को महँगे स्कूल कॉलेजों में भेजकर उनकी भारी फीस का लबादा ओढ़ रहे हैं। चालीस साल पहले एक बच्चा अग्रवाल स्कूल में पढ़ता था, फीस थी एक रुपया, उस एक रुपय्या को बचाने के लिए फीस माफ़ कराने की लाईन में ग़रीब…

अमीर भाई अपनी ग़रीब बहनों की तरफ नफ़रत की नज़र से देख रहे हैं

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अमीर भाई अपनी ग़रीब बहनों की तरफ दया-करुणा की नहीं नफ़रत की नज़र से देख रहे हैं
अमीर भाई अपनी ग़रीब बहनों की तरफ दया-करुणा की नहीं नफ़रत की नज़र से देख रहे हैं, जबकि अमीर भाई का फ़र्ज बनता है कि गरीब बहन की मदद करें, मदद नहीं करें तो कमों का फल यहीं मिल जाता है शादी के बाद बहन की ज़िंदगी पूरी तरह से बदल जाती है, या तो वह महलों में राज करती है या नहीं तो छोटे से घर में तड़प-तड़पकर जी लेती है। इसलिए बहनों की रक्षा करना उनके माता-पिता का ही फ़र्ज नहीं है बल्कि भाईयों का भी फ़र्ज बनता है। आजकल तो भाईयों को अपनी बहन की ग़रीबी दिखाई ही नहीं देती है, भाई लोग अमीरी के मज़े लूटते हैं तो बेचारी बहन सड़-सड़कर जी रही होती है। भाई अपनी पत्नी और बच्चे का गुलाम हो जाता है। तो वह बहन का कुछ अच्छा नहीं चाह सकता है। लेकिन भाईयों को चाहिए कि वे लोग बहन की सदा के लिए मदद करते रहें। दो भाईयों की एक बहन की शादी एक बहुत ही बड़े महल जैसे घर के बेटे से हुई। भाईयों ने सोचा कि बहन को अब जीवन भर पलटकर देखने की ज़रूरत ही नहीं है। मन में सोच रहे थे कि चलो हमारी पीड़ा तो चली गयी, तीस साल की हो गयी थी, कोई उससे शादी …

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