इधर जनसंख्या कम हो रही है, उधर दस करोड़ लोग गरीबी रेखा से हर दूसरे साल ऊपर आ रहे हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं

पिछले दिनों एक अच्छी ख़बर आ रही है कि भारत में हर मिनट में पहले पैंतालीस बच्चे पैदा हुआ करते थे, अब एक मिनट में उनतीस बच्चे पैदा हो रहे हैं। क्योंकि अब यह सिलसिला थमना ज़रूरी था, क्योंकि जो जी रहे हैं उनको को भोजन ठीक से मिल जाये तो बढिया होता है। भारत की एक सौ तीस से चालीस करोड़ तक की आबादी से भारत ही नहीं सारा विश्व भी मज़े लूट रहा है, सारे भारत के ही लोग दुनिया भर में फैले हुए हैं, भारतीयों के बारे में कहा जाता है कि वे खुशमिज़ाज, संयमी, भगवान से डरने वाले और अपने काम से मतलब रखने वाले, शांतिप्रिय लोग होते हैं। यह गुण मुसलमान भी पैदा कर लें तो ठीक रहेगा।
जनसंख्या बढ़ने से एक ही नौकरी पर चार चार लोग नज़र ताकते हुए बैठे रहते हैं और बददुआ देते हैं कि वह मर जाये तो मैं उसी नौकरी पर चढ़ जाऊँ। पहले की फिल्मों में मुकरी-टुनटुन के दस दस बच्चों की फौज दिखाई जाती थी, उस समय हरेक फिल्म का कॉमेडी ट्रैक ढेर सारे बच्चों से ही दिखाया जाता था।
तब के भोजन में मिलावट नहीं थी, तीर भी निशाने पर लग जाता था तो बच्चे पैदा होते ही रहते थे। आजकल तो भोजन इतना नक़ली है कि तीसरा या चौथा बच्चाही बेदम पैदा होता है। आजकल तो पहला ही बीमारी लेकर पैदा होता है, किसी बच्चे को पैदा होने के साथ ही अस्थमा, किसी बच्चे को दिल में सुराख, किसी को बार बार पेटदर्द की शिकायत होती ही रहती है, क्योंकि आजकल की छोटी जवान लड़कियों को पता नहीं क्यों दूध पीने से बेज़ारगी आती है, जबकि दूध ही सबसे ताक़तवर चीज़ होती है, जो प्रजनन के लिए ही नहीं, जीवन की हरेक बीमारी से लड़ने में सक्षम होता है। लड़कियाँ दूध नहीं पीती हैं उससे शादी के बाद उनको हष्ट पुष्ट बच्चे नहीं होते, जबकि लड़कियों को ढूँस ढूँसकर दूध पिलाया जाना चाहिए।
पहले का ग्यारहवाँ बच्चा भी हष्ट पुष्ट हुआ करता था। तब कैलेंडर एक हिसाब से बनाया जाता था, जो नर (पुरुष) था वह मादा (स्त्री) को उम्मीद से करके हट जाता था, मादा बच्चा पैदा करते ही दूध बादाम, पिस्ता खाती थी, वह भी असली, फिर नर दवासाज़ की दुकान से कुछ ताक़त की दवाई लाता था, फिर नर प्रजनन के लिए तैयार हो जाता था, दंड बैठक, कुश्ती लड़ता रहता था दंगल में जाकर। और फिर पिक्चर शुरू चिंता ता ता चिता चिता चिंता ता ता ता तात.....फिर किलकारियाँ गूंजा करती थीं। आजकल बच्चे नकली भोजन की वजह से हष्ट पुष्ट नहीं हो रहे हैं नहीं तो भारत की जनता आज भी तैयार है जीवन में दो चार पलंग तोड़ने के लिए। अब जनसंख्या की रोक पर तो मैं मोदीजी को ही ज़िम्मेदारी नहीं मानूँगा। क्योंकि पहले ही एक जीएसटी नाम का बच्चा है गौरीशंकर तिवारी यानी जीएसटी।
दूसरी बात संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि भारत में हाल ही में १० करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गये हैं, यह बहुत ही अच्छी खबर है, इसके लिए मोदीजी कोही श्रेय दिया जाना चाहिए। मोदीजी ने अद्वारह हज़ार गाँवों को बिजली दी है, इससे उन परिवारों को रात में भी काम करने का अवसर मिलता है बच्चे पढ़ पा रहे हैं, इंटरनेट से नौकरी भी ढूँढ पा रहे हैं। वरना मोमबत्ती या लालटेन में काम नहीं हो पाता है। मोदीजी जनता के पैसे का सदुपयोग देश के लिए ही कर रहे हैं। इससे जनता को बहुत राहत मिल रही है।
पिछले दिनों मोदीजी ने सख्त आदेश दे दिया है कि भारत के हरेक ग़रीब को वे मकान देंगे और इस पर हरेक अधिकारी को अंतिम चेतावन तो सारा देशगंगा नहा जाये क्योंकि इंसान के जीवन के पचपन साल तो साला मर मरकर घर बनाने में ही निकल जाया करते हैं। अब सरकार मकान देगी तो लोग खुलकर देश की प्रगति के लिए काम करना चाहेंगे। हमारा यही कहना है कि इस सरकारी मकान की मिल्कियत सरकार को अपने पास ही रखनी चाहिए क्योंकि कुछ लोग जुएँ, शराब में घर को गिरवी रख देते हैं जिससे पत्नी और बच्चों का जीवन दूभर हो जाता है, इसीलिए एक क़ानून निकाला जाना चाहिए कि सरकारी मकान को गिरवी नहीं रखा जा सकता है। उसका मालिक वह व्यक्ति हो सकता है, लेकिन उसके ऐवज में वह किसी तरह का क़र्ज नहीं ले सकता है। क्योंकि सरकार मकान बनाकर पहले ही उसे दुनिया भर के ख़र्च से मुक्त कर रही है, अब बस उसका काम है कि वह भोजन जुटा ले, कपड़ा जुटा ले।
किराये के घर में रहकर ही लोगों की जान निकली जा रही है। उधर बैंक से उधार लो तो बैंक तो कमर ही तोड़ दिया करते हैं मकान बैंक से लिया जाये तो अगर उसकी बीस चालीस किस्तें भी बच गयी तो उस घर को बैंक ही बाद में ज़ब्त कर लेता है। क्योंकि किसी कारण से घर मालिक किस्त नहीं भर सका तो उसी को घर से धक्के मारकर निकाला जाता है। यह तो बहुत ही ख़राब क़ानून है, इसके बदले सरकार को उस आधी किस्त भरे हुए इंसान को उस मकान से निकालकर कहीं और उससे छोटा मकान दे देना चाहिए क्योंकि उस बेचारे ने तो आधी किस्तें तो भर ही दी हैं। तो बेचारा आधा क़र्ज चुकाकर भी सड़क पर मारा मारा फिरे यह तो भारत की जनता के साथ अन्याय ही होगा।
कभी कभी हालात इतने बुरे हो जाते हैं कि घर के व्यक्ति को फालिज का अटैक आ जाता है। फिर भी वह किस्त भरता ही रहता है। या फिर पत्नी को ही झकमारकर पैसा भरना पड़ता है, बच्चों को भी अधूरी पढ़ाई करके काम करना पड़ता है। उधर घर की महिलाएं अपने घर के चक्कर में सिर में माईग्रेन लेकर, पाइल्स लेकर, शुगर बीपी लेकर, हार्ट की समस्या लेकर, कमर तोड़कर उसपर पट्टा लगाकर भी काम करते ही चले जा रहे हैं ताकि अपने घर के नाम पर कुछ तो हो। सच में यह अपना घर का चक्कर सिरफोडू और जान लेवा साबित हो रहा है। इसीलिए मोदीजी को जल्दी से जल्दी मकान बनाकर देना चाहिए।
जावेद अख्तर ने एक बहुत ही खराब गीत लिखा था कि ये तेरा घर ये मेरा घर ये घर बहुत हसीन है, इस गीत को सुनकर हरेक पति और पत्नी अपना घर बनाने के चक्कर में रह गये और सारी जिंदगी निकल गयी। क्या ज़िंदगी में तेरा घर ये मेरा घर ही रहता है, क्या माता पिता, भाई बहन कुछ नहीं रह जाते हैं। सभी को कचरे के डिब्बे में डालकर एक आलीशान सा घर बनाया जाता है। न ज़िंदगी के मज़े ले सके न कुछ। अब जाकर घुटनों में दर्द, हरेक जोड़ में दर्द हो गया है, चलते हैं तो हड्डियों में से संगीत बजने लगता है। मुँह से आह ऊँह की आवाजें आती रहती हैं, तो ऐसे घर पर तो लानत हैं, जो इंसान की जान जोखिम में डालकर बनाया गया हो। सो, मोदीजी को चाहिए सभी क __अब चूँकि कारों की बिक्री तीस प्रतिशत गिर चुकी है, महँगे कॉलेजों में भर्तियाँ नहीं हो रही हैं। कमाओ और लुटा दो के कल्चर से रिसॉर्ट कल्चर बढ़ चला है। लोग बीमार होने से डरते हुए बाबा रामदेव की दवाखाकर आराम का जीवन जी रहे हैं, मोदीजी ने कहा है कि फिट रहो और उनके पाँच लाख आयुष्मान भवा के बचाओ तो लोगों ने फिट रहना भी शुरू कर दिया है। अब तो महँगे किराये
वडी जैसी व्यस्त जगहों पर भी किराये की दकानें खाली की खाली पडी हई हैं। दकानों की दादागिरी पूरी तरह से समाप्त होती चली जा रही है। क्योंकि किसी के पास दो लाख पाँच लाख की पगड़ी देने की ताक़त ही नहीं रह गयी है। उतना पैसा लगाओ फिर व्यापार की कोई गारंटी नहीं है। __ यह सारे हालात इस ओर इशारा कर रहे हैं कि हम बहुत ही तेज़ी से समाजवाद की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ पैसे की क़द्र कम हो रही है और भारतीयता का जो असली जीवन है उस ओर भारत के लोग लौटना चाह रहे हैं। पैसों की इस भागदौड़ से लोग उकता चुके हैं। लोग निनानवे के फेर से तुरंत निकलना चाहते हैं। जो पिता है वह अपना हिस्सा लेकर बच्चों को व्यापार को सौंपकर तीर्थ यात्रा पर चले जा रहे हैं। लोग भारत के बम धमाके देखकर विदेश भाग गये थे अब भारत से ज्यादा धमाके तो विदेशों में हो रहे हैं। सो, मोदीजी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए और इसी मुद्दे पर विदेश में रह रहे रिटायर लोगों को भारत में आकर अपना जीवन बसर करना चाहिए।
मैं तो कहता हूँ कि अब बच्चे बच्चे जो अद्वारह साल के हैं उनको भी दस या पंद्रह हज़ार की नौकरी कर लेनी चाहिए। क्योंकि सभी का पैसा लुट चुका है, पहले क्या था कि अमीर ग़रीब को हिकारत की नज़र से देखता था, लेकिन अब तो सारे के सारे ग़रीब हो गये हैं। सो, अब बिना किसी झिझक के लोगों को छोटी ही सही नौकरी कर लेनी चाहिए। इवनींग कॉलेज का कल्चर बढ़ाकर सुबह बच्चों को नौकरी करनी चाहिए। पक्की नौकरी क्योंकि आजकल जोमैटो, ऊबर ईट्स, में पहले तो डेलेवरी के बहुत सारे ऑर्डर देकर जवान बच्चों को कमीशन दिया जा रहा है, फिर तीन महीने के बाद उसी बच्चे को दिन भर में तीस ऑर्डर की जगह केवल छह या दस आर्डर आ रहे हैं जिससे उसकी कमाई में कमती आ रही है। सौ, नौजवानों को झूठी नौकरी छोड़कर पक्की नौकरी करनी चाहिए।
क्योंकि सच्ची बात तो यह है कि सभी नौजवान बच्चों के माता पिता नौकरियाँ कर करके पूरी तरह से टूट चुके हैं वे हिम्मत हार चुके हैं, उनका सहारा अब बच्चों को बनना चाहिए। उनका शरीर जवाब दे चुका है, इसीलिए जो है उसी में खुश रह लेना चाहिए। आजकल क़रीब दो करोड़ लोग तो फ्रीलांस का काम कर रहे हैं, इसमें एक प्रोजेक्ट होता है, उससे पैसा कमाकर वह कुछ महीने घर बैठ जाता है, फिर दोबारा कोई और काम करता है, तो इस तरह से इसी तरह का कल्चर आगे जाकर भी होने वाला है। लोग अपने घर से अपना ऑफिस चला रहे हैं क्योंकि सारे लैपटॉप में सारे दफ्तर का काम हो जाया करता है तो अलग से दफ्तर खोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ रही है।
समय के साथ चलते हुए अब जीवन सुखद स्थिति में पहुँच रहा है, इसीलिए ऊँची उड़ान न भरते हुए, जो है उसी में खुश रहकर जीवन जीना चाहिए। आप देखिये कि मुकेश अंबानी हमारे बड़े भाई से भी बढ़कर निकले हैं फोन कितना सस्ता कर दिया और अब इस पंद्रह अगस्त को इंटरनेट भी कम से कम दाम पर देने वाले हैं, उन्हीं की वजह से आज हरेक घर में तीन हज़ार रुपये की बचत हो रही है। तेरे जैसा भाई सबको मिले, तेरे जैसा भाई सबको मिले...।
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