क्या अपने ही साले, जीजा और बहन की प्रगति नहीं चाहते साले ऐसा क्यों करते हैं?

मेरे से ज़्यादा पैसा मेरे किसी भी रिश्तेदार के पास नहीं होना चाहिए| ऐसी बात आजकल हरेक के मन में हो गयी है| कोई किसी से आगे बढ़ रहा है यह किसी से देखा नहीं जा रहा है| कोई किसी के पास मर जाता है तो यही सोचा जाता है कि अब वो इंसान तो मर गया अब देखते हैं उसका घर कैसे चलता है| फिर उस परिवार की मदद तक नहीं की जाती है, बैठकर सारे लोग तमाशा ही देखते रहते हैं कि वह परिवार कैसे ग़रीबी में पल रहा है, उनकी ग़रीबी देखकर उनको बहुत ही मज़ा आता रहता है|  

लोग पहले तो यह चाहते हैं कि मेरे सगे भाई के पास मेरे से पैसा कम होना चाहिए| भाई के बच्चे पैसे पैसे को मोहताज होते रहना चाहिए, जबकि मेरे बच्चे राज करते रहने चाहिए| और जिसके पास पैसा कम हो वह भाई तड़पता रहना चाहिए| ऐसा लोग चाहते हैं फिर जो लोग ऐसा चाहते हैं कि वे लोग भाई की बर्बादी के बाद अपने जीजा या साले की बर्बादी का सोचते हैं| जीजा चाहता है साले के पास पैसा नहीं होना चाहिए और साला चाहता है कि मेरे जीजा के पास पैसा कम से कम होना चाहिए और जीजा साले के टुकड़ों पर पलता रहना चाहिए| यह तो बहुत अजीब बात है कि साला अपनी बहन के घर को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहता है| यह है तो बहुत ही बुरी बात है लेकिन ऐसा हो रहा है| सगी बहन की बर्बादी तक को लोग नहीं छोड़ रहे हैं| यह तो इंसानियत की मौत के बराबर वाली बात हो गयी है, लेकिन लोग इतना राक्षसीपन चाह रहे हैं| कई बहनें होती हैं जो घर ख़रीदते समय अपने सगे भाई को लेकर जीजा के साथ भेजती हैं लेकिन साला यानी बहन का भाई क्या करता है कि ख़रीदने वाले घर में दुनिया भर की कमियॉं निकालकर लाता है, वह कहता है वास्तु का दोष है, वह अंदर ही अंदर सोचता है कि यह घर तो मेरे घर से भी बेहतर है मेरे जीजा मेरे से बेहतर घर कैसे बना सकते हैं? इसलिए वह नहीं चाहता कि जीजा का घर यानी बहन का घर मेरे घर से बेहतर होना चाहिए| ननद और भाभी का भी मुक़ाबला चलता ही रहता है तो वह बात भी दिल में अंदर ही अंदर रहती है|

एक जीजा अपने साले को अपने साथ लेकर गया और एक ज़मीन दिखाई और कहा कि ये ज़मीन केवल एक लाख रुपये में ही मिल रही है, तो साले को बहुत ही जलन हो गयी कि जीजाजी को इतने में ही कैसे ज़मीन मिल गयी, तो उसने जीजाजी से कहा कि जीजाजी बाद में जाकर इस ज़मीन के नीचे बड़ी-बड़ी चट्टाने निकलेंगी जिन्हें तोड़ने में ही आपके दो लाख रुपये चले जाएँगे| बेचने वाला तो बेचकर चला जायेगा, रेजिस्ट्री हो गयी तो वह वापस तो नहीं लेगा| फिर जीजाजी ने उस साले की बात मान ली, दूसरी तीसरी बार ज़मीन दिखाई तो ईस्ट फ़ेसिंग नहीं है कहा, फिर कहा कि यहॉं पर फ़ैक्टरी बनने वाली है यहॉं पर मत लीजिए, इस तरह से जीजा पूरी तरह से साले पर निर्भर होता चला गया और साला है कि जीजा को ज़मीन ही नहीं लेने दे रहा था, वह अंदर ही अंदर चाह रहा था कि जीजाजी फ़्लैट लें, क्योंकि ज़मीन का मोल तो हमेशा से ही बढ़ता रहता है| फ़्लैट में तो ज़मीन तो अपनी होती ही नहीं है और फ़्लैट तो तीस साल के बाद पुराना हो जाता है, उसका रेट ही नहीं आता है, रीसेल करने के लिए, सो, इतनी लंबी बर्बादियों के बारे में सोचकर साले लोग हर चाल चला करते हैं| इसलिए कल को इस ज़मीन का रेट एक करोड़ हो गया तो जीजाजी के पास पैसा बहुत हो जायेगा, मेरे रहते जीजाजी के पास इतना सारा पैसा नहीं होना चाहिए|
एक जीजाजी ने क्या किया कि साले के लाख मना करने के बाद भी एक जगह पॉंच सौ ग़ज़ ज़मीन ख़रीद ली, साला चिल्लाता रह गया कि यह ज़मीन बहुत ही ख़राब है, बाद में यहॉं पर नेताओं का क़ब्ज़ा होने वाला है, जीजाजी ने सारे के सारे पैसे बर्बाद कर डाले, साले की बहन यानी जीजा की बीवी ने भी कहा कि मेरा भाई कह रहा है तो सच ही कह रहा है, उसकी ही बात मान लीजिए, बहन ने कहा कि वह मेरा भाई ही है, भला दुनिया का कौनसा भाई अपनी बहन की बर्बादी चाहता है, जीजाजी ने कहा कि तुम बहुत ही भोली हो आजकल की दुनिया कैसे चलती है यह तुमको पता नहीं, ख़ैर यह सब छोड़ो वह बात की गहराई में नहीं जाना चाहता था, क्योंकि बहन तो भाई का ही साथ देती है, और दुनिया की हर औरत अपने मायके की बुराई नहीं सुनना चाहती है|
जीजाजी ने कहा कि मैं बेवकूफ़ नहीं हूँ, मैं भी सोच समझकर यह ज़मीन ले रहा हूँ| मेरा भी दिमाग़ काम करता है, कई दिन तक बहन जीजा का झगड़ा चल रहा था, साला मोबाइल से बहन को बहुत भड़काता रहता था, जीजा ने साले को बुलाकर कहा कि तुम इस ज़मीन को क्यों नहीं लेने दे रहे हो, एक तो मैंने तुमको इसलिए बुलाया था कि तुम मेरा भला चाहोगे, मगर तुम तो काम में टांग ही अड़ाते जा रहे हो| अगले दो साल तुम्हारा यहॉं आना बंद और मेरी बीवी का भी मायके जाना बंद करवा देता हूँ| साले ने कहा जैसी आपकी मर्ज़ी, फिर जीजाजी ने वहॉं पर मकान बनाना शुरू कर दिया, लेबर बहुत ही महंगा जीजाजी ले रहे थे, पत्नी ने उनको कहा कि मेरा भाई मज़दूर सस्ते दाम पर ला सकता था, जीजाजी ने कहा कि इस तरह के अहसान नहीं लेने चाहिए, साला मेरा, ज़िंदगी पर सुनाता ही रह जाता कि मेरी वजह से मकान बना है, इसलिए चार पैसे ज़्यादा लगे, लगने दो मगर तुम्हारे भाई का अहसान नहीं चाहिए|
घर बना, वास्तु वाले को एक लाख रुपया दिया गया, जबकि साले को पूरी वास्तु का पता था, मगर जीजाजी ने कहा वह हमारी बर्बादी चाहता है, अगर वह वास्तु ग़लत बतला देता तो हमारी तो शामत आ जाती, गृहप्रवेश के दिन सभी को  बुलाया गया साले साहब को वह मकान बिल्कुल भी पसंद नहीं आया| अंदर ही अंदर तो बहुत पसंद आ रहा था लेकिन वह कमीबेशी ही निकालता चला जा रहा था| पत्नी यानी बहन को ग़ुस्सा आ रहा था, लेकिन जीजाजी को साले की फ़ितरत मालूम हो गयी थी, इसलिए वे साले की बात को चुपचाप सुनते चले जा रहे थे| उन्होंने कुछ नहीं कहा| आज जीजाजी उसी घर में दस साल से रहे हैं और उनको किसी भी चीज़ की द़िक्क़त महसूस नहीं हो रही है, और साला कह रहा है कि शहर से इतनी दूर घर लेने की क्या ज़रूरत थी, इतने में क्या हुआ कि शहर में मेट्रो रेल आ गयी, सो, अब घर को आने जाने में केवल पच्चीस मिनट का ही समय लगता है, सो दूरियॉं भी कम हो गयी और मेट्रो रेल के आने से उनके घर के दाम बीस लाख से जाकर दो करोड़ रुपये हो गये तो जीजाजी अब यह मकान दो करोड़ में बेचकर दूसरी जगह पर दो तरह के आलीशान विल्ला ख़रीदने का सोच रहे हैं| सो, साले को अपने घर का सोचना चाहिए और जीजा को अपने घर का सोचना चाहिए और बहन का घर तो हमेशा आबाद रखने की कोशिश करनी चाहिए, बहन का घर बर्बाद करने गये तो हमारा घर भी बर्बाद हो जाता है| क्योंकि भाई और बहन एक ही पेट से जन्मे होते हैं ईश्‍वर भी नहीं चाहता कि कोई भाई अपनी बहन का ही घर बर्बाद करे|
एक दूसरे घर में तो अजीब हालात है घर की बड़ी बहू का मायका घर के पास ही है, सो, बड़ी बहू का मायका घर के पास ही है, तो बहू रोज़ाना दस बजे जो मायके चली जाती है तो शाम को पति ड्यूटी से लौटता है तभी वह अपने ससुराल वापस आती है, दिन भर मायके में ही रहती है, मायके में उसके दो भाई हैं जो उसे बहुत चाहते हैं और वे चाहते हैं कि बहन के ससुराल का घर नहीं बिके| जबकि बड़ी बहू की दो और छोटी बहुएँ ससुराल में हैं जो चाह रही हैं कि वह तीन मंज़िला मकान जिसपर सारी बहुओं का हक़ है वह जल्द से जल्द बिक जाये, क्योंकि वह मकान बहुत ही छोटी सी गली में है, पानी का टैंकर भी वहॉं नहीं आ सकता, पानी की क़िल्लत रहती है तो बहुत दूर से टैंकर से घड़े भरकर लाना होता है, स्कूटर पलटाने की भी जगह नहीं है, गली में रात में अँधेरा रहता है, दो छोटी बहुएँ कार ख़रीदना चाहती हैं क्योंकि उनके दोनों लड़के बड़े हो चुके हैं, दूर जाना होता है तो बेचारे दो स्कूटरों पर जाते हैं, रात में दो बजे भी बहुएँ लाखों का ज़ेवर पहनकर स्कूटर पर ही आती हैं तो यह सब बुरा लगता है, लड़कियों का आना-जाना मुश्किल हो जाता है| और सबसे बड़ी मुसीबत क्या है कि घर की सीढ़िया घर के अंदर से बनी हुई हैं जिससे छोटी बहू के कमरे में से सारा का सारा रास्ता बना हुआ है| सो, प्राइवेसी नाम की कोई चीज़ ही नहीं है, रात में बड़ा बेटा एक बजे घर आता है तो छोटी बहू को ही दरवाज़ा गहरी नींद से उठकर खोलना पड़ता है, लेकिन चूँकि बड़ी बहू का मायका वहीं पर नज़दीक है इसलिए वह बहू चाहती ही नहीं है कि वह घर बिके, पिछले पंद्रह साल से यही झगड़ा चल रहा है, और बड़ी बहू हमेशा यह कहकर बात को टाल जाती है कि मैं घर की बड़ी हूँ, और इसमें सबसे बड़ा अडंगा तो बड़ी बहू के भाई हो रहे हैं| वे इस परिवार को बुरी हालत में ही देखना चाहते हैं|
वो साले इस परिवार को पनपने ही नहीं देना चाह रहे हैं| क्योंकि वे चाहते हैं कि उनकी बड़ी बहू को यानी बहन को पूरी तरह से उस घर में आज़ादी मिली हुई है, सारा भोजन तो दो बहुएँ बना ही दिया करती हैं| बड़ी बहू दिन भर मटकते हुए कभी इसके घर तो कभी उसके घर पर आती-जाती रहती है| सो वे चाहते हैं कि बड़ी बहू का जो राज है वह ख़त्म न हो जाये इसलिए वह घर बिकने नहीं देते हैं| बड़ी बहू अपने भाईयों के घर जाती है तो वहॉं उनको भोजन के समय फुलके बनाकर देती है इससे उनकी बीवियों को आराम मिलता रहता है, सो, उनकी बहुएँ भी यह बहन को बहुत काम करने वाली है, इसलिए उसे पूरी तरह से पटाकर रखा करते हैं|
एक दिन तंग आकर बड़ी बहू के देवर ने वह घर छोड़ दिया| उसके बाद वह जो पोर्शन ख़ाली हुआ उसमें बड़ी बहू ने क़ब्ज़ा जमा लिया| जबकि देवर चाह रहा था कि वह उसका पोर्शन किराये पर दे दे| लेकिन बड़ी बहू ने कहा कि हम पराये किरायेदारों के साथ क्यों रहेंगे| इसलिए बड़ी बहू ने कहा कि तेरे तीन कमरो पर हमारा क़ब्ज़ा रहेगा और इसका किराया भी हम नहीं देंगे, रहना है यहॉं रहो, भला हम क्यों दें अपने ही घर का किराया, ऐसा कहकर बहू ने उस पोर्शन पर अपना अधिकार जमा लिया, पोर्शन जो ख़ाली हुआ उसमें अब उसी बड़ी बहू के भाई यानी साले लोग आकर रहा करते हैं| दिन भर सोया करते हैं शाम को अंगड़ाईयॉं लेते हुए अपने घर को जाते हैं|
सो, नये ज़माने में इस तरह की परंपरा शुरू हो गयी है कि साले लोग ही अपने जीजा के घर को बर्बाद करने में लगे हुए हैं अब सालों की जीजा के घर में इतनी चलती है कि वे ़िफ्रज टीवी, सभी सामान साल ही लाकर देते हैं और वे सारा सामान अपने घर के सामान से कम ही दाम का लेकर आते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि जीजा का घर उनके घर से बेहतर हो| इस तरह से किसी के भी घर को बर्बाद करने की आदत नहीं डालनी चाहिए| किसी साले को जीजा के घर में दख़ल उतना ही देना चाहिए जितना कि जीजा साले से पूछते हैं जबकि साले लोग बहन के घर पर पूरा तरह से क़ब्ज़ा कर लेते हैं बहन जब भी सोना या ज़ेवर ख़रीदती है तो भाईयों को बहुत ही बुरा लगता है वे कहते हैं कि अगले ही महीने सोने के दाम पूरी तरह से गिरने वाले हैं तो बहन क्या करती है कि रात में अपनी पति से झगड़ा करने लग जाती है जिससे सालों की वजह से घर में तनाव हो जाता है, बहन का घर अपने घर से बेहतर होना चाहिए| तभी भगवान अपने को भी घर देता है, ख़ुद बहन ही घर बनवाकर दे देती है, जीजा भी साले को बहुत चाहने लग जाता है| एक दूसरे का घर बसाने की कोशिश करनी चाहिएष बर्बाद करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए|

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