Posts

मोदीजी कालाधन की परिभाषा कैसे करेंगे

Image
मोदीजी कालाधन की परिभाषा कैसे करेंगे, अपने आपको आप देश के ग़रीब नागरिकों के साथ जोड़कर देखिये, जो आपके पास धन है उससे हिसाब लगाकर देखिये कि कालाधन क्या है, तब पता चल जायेगा कि आपके पास कितना काला धन है  जैसे-जैसे नोटबंदी के दिन बढ़ते जा रहे हैं लोग दूसरे लोगों से सवाल कर रहे हैं और अपने दिल और मन से भी पूछ रहे हैं कि मेरे पास जो धन है वह कालाधन है या सफ़ेद धन हैं? एक पत्रकार के नाते मैं आपसे नैतिक सवाल करता हूँ कि आपके पास जितना धन है क्या उतना ही भारत के आम नागरिक के पास है| एक आम आदमी की महीने की तनख़्वाह छह हज़ार से एक लाख रुपये तक हो सकती है, लेकिन क्या छह हज़ार रुपये जिसकी तनख़्वाह है क्या वो चैन से जी पा रहा है| अगर नहीं जी पा रहा है, तो आपके पास अगर तीस लाख से अधिक का धन है वह काला धन है| सरासर कालाधन है, आपके पास के तीस लाख यानी दस लाख के ब्याज से भोजन, दस लाख के ब्याज से रखरखाव और बचे दस लाख के भोजन से कपड़े लत्ते, यानी एक व्यक्ति के लिए तीस लाख पर्याप्त होते हैं, क्योंकि आजकल हरकोई दस साख शेयर-म्युचुअलफ़ंड में डालता है, या उसके मेच्योर होकर दस लाख हो चुके हैं, दस...

मोदीजी, नोटबंदी आने से समुभय इंसानियत से भरा भारत लौट रहा है

मोदीजी, नोटबंदी आने से समुभय, इंसानियत से भरा भारत लौट रहा है, लोग होटलबाज़ी से ऊबकर घर की ओर लौट रहे हैं  नोटबंदी करने से नयी पीढ़ी में फ़ैशनबाज़ी, होटलबाज़ी, गुलछर्रेबाज़ी में बहुत कमी हो गयी है, नयी पीढ़ी नोटों की सप्लाई नहीं होने की वजह से सालों के बाद घरों के भीतर दिखाई दे रहे हैं| यह परिवारो के लिए बहुत ही अच्छा संदेश दिखाई दिया| लोगों के पास सिनेमा देखने के लिए चार-चार हज़ार रुपये नहीं दिखाई दिये|  लोगों को तनख़्वाह भी बहुत ही धीरे-धीरे करके मिलने लगी थी| कुल मिलाकर कुछ समय तक रुक कर जीवन के बारे में सोचने का समय भी लोगों को मिला और नोटों की अहमियत लोगों को पता चली| लेकिन एक बात तो तय है कि लोग जब शॉपिंगबाज़ी के बारे में नहीं सोचते हैं तो देश के लिए सोचने लग जाते हैं, और इस समय मोदीजी ने देश को सबसे अच्छा माहौल दिया है| कहीं पर भी सांप्रदायिकता नहीं है, कोई भी हिंदू-मुस्लिम के अलग-अलग होने की बात तक ज़ुबान पर नहीं ला रहे हैं| लोग जातिवाद की बात पर भी ज़ुबान पर नहीं ला रहे हैं| इस समय शेयर बाज़ार बहुत ही अच्छे तरीक़े से चल रहा है| लगभग २७ हज़ार के पार चल रहा है| यानी आपके पास पै...

नवाज़द्दीन ने रईस फ़िल्म में बहुत यादगार रोल निभाया

शाहरुख़ ख़ान से बेहतर और बहुत यादगार रोल निभाया है नवाज़द्दीन ने रईस फ़िल्म में  रईस फ़िल्म वैसे तो एक मसाला फिल्म की तरह ही है, इसमें शाहरुख़ ने जैसा अभिनय किया है, उससे कहीं बेहतर अभिनय अमिताभ बच्चन ने दीवार फ़िल्म में किया था, अब जाकर दीवार की अहमियत सामने आ रही है| लेकिन यहॉं रईस में शाहरुख़ ख़ान ने अतुल कुलकर्णी को मारते समय जो रो-रोकर उसकी हत्या करने का शांत अभिनय किया है वह लाजवाब है और दूसरे एक दृश्य में ग़ुस्से में फ़ोन पटकने का दृश्य है वह भी अति उत्तम है| अब आते हैं लिटिल मास्टर नवाज़ुद्दीन भाई पर|  नवाज़ का न चेहरा है, नक़द है, न काठी, न शरीर से बलवान, लेकिन एक्टिंग की मशीन| रईस फ़िल्म में निर्देशक राहुल ढोलकिया ने हालॉंकि नवाज़ को लंबे स्क्रीनप्ले नहीं दिये,ज़्यादा बाज़ी मार सकते थे| सीधे कट टू कट लगभग क्लोज़ अप दृश्य दिये हैं, जबकि शाहरुख़ को लंबे-लंबे स्क्रीनप्ले दिये हैं| लेकिन उनमें भी कम स्कोप रहने पर भी नवाज़ भाई ने अभिनय में जो जादू जगाया है, वह कम से कम कहें तो बहुत जादुई है| हर दृश्य को असीम गहराई से किया है, राहुल ने उन्हें कैमरा प्लेसमेंट बहुत ही अच्छी जगह दिये हैं हर...

नोटबंदी का बहुत फ़ायदा हुआ है

Image
नोटबंदी का बहुत फ़ायदा हुआ है लोगों का ख़ून चूस कर धन संचय करने की आदत कम हुई है, अब सरकार को वंचित लोगों का भला करना चाहिए   नोटबंदी के बाद महँगाई आश्‍चर्यजनक तरीक़े से कम हो गयी है, टमाटर पॉंच रुपये किलो हो गये थे, सड़कों पर फेंके जा रहे हैं, टमाटर सस्ते इसलिए हो गये कि दरअसल इसका सही दाम यही हुआ करता था, ये तो बिचौलिये थे जो इसका काम दाम बहुत ज़्यादा करने जनता को लूटा करते थे, अरहर-तुअर की दाल के दाम आश्‍चर्यजनक तरीक़े से कैसे नीचे आ गये, क्योंकि नोटबंदी के कारण लोगों ने महँगी दाल ख़रीदना बंद कर दिया था, तो व्यापारियों ने सोचा कि इतनी महँगी दाल बेचेंगे तो कोई लेगा नहीं, लोग दूसरी दालें खा लेंगे, और हमारी अरहर की दुकानें बंद हो जाएँगी, फिर लोगों ने या कहिए कालाबाज़ारियों ने झक मारकर नोटबंदी के कारण दाल को सस्ती कर दी और आज दाल सत्तर रुपये से लेकर केवल नब्बे रुपये में बेच रहे हैं, जबकि नोटबंदी के पहले यही दाल १६० रुपये से लेकर २५० रुपये किलो तक बिक रही थी| कालाबाज़ारी लोग अब लहसुन के दाम बढ़ा रहे हैं, ये वे ही कालाबाज़ारी करने वाले लोग है जो बाज़ार में किसी न किसी तरह का षड़यंत्र किया...

मोदीजी क्या व्यापारियों को पेंशन दी जायेगी? - EDITOR NEERAJ KUMAR

नोटबंदी की वजह से दो महीने के भीतर कई व्यापारियों की दुकानें व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं, क्या व्यापारियों को पेंशन दी जायेगी?  नोटबंदी में सारे देश की जनता ने मोदीजी का भरपूर सहयोग दिया है| मोदीजी अब इस समय उन लोगों की ओर ध्यान न दें जो कालाधन को सफ़ेद करने में सफ़ल रहे| क्योंकि करोड़ों लोगों के दिल में भ्रष्टाचार रग-रग में बस चुका था| लोगों में धारणा घर कर गयी थी कि पैसा होगा तभी इज़्ज़त होगी| रिक्शावाला से लेकर अरबपति सभी के लिए पैसा ही भगवान हो गया था| और इन बीस साल में सच में पैसा ही भगवान हो चुका था, पैसा है तो आप भगवान नहीं तो हैवान  कहला रहा था, इंसान| इस ज़माने में जो भ्रष्ट लोग हो गये थे, उनके आगे-पीछे सारी दुनिया चल रही थी, अगर आपने कहा कि मैं ईमानदार हूँ, तो लोग आपको गालियॉं दे रहे थे| पूरी तरह से उल्टी गंगा बह रही थी|  लोगों ने ईमानदारी में जीकर देखा तो उसमें नसीहतें, गालियॉं, ज़लालत, हिकारत, मुफ़लिसी, यही मिल रहा था| बहुत अच्छा हुआ कि मोदीजी ने नोटबंदी कर दी, इससे लोगों को एहसास तो हो गया कि जो पैसा भगवान माना जाता था, उसी पैसों पर चोंट की जा सकत...

क्या आज के समय में ससुराल से पैसा लेना ठीक है - EDITOR NEERAJ KUMAR

क्या आज के समय में ससुराल से पैसा लेना ठीक है या नहीं, हम नहीं लेते तो बच्चे हमें ताने मारते हैं कि आपने ईमानदारी की ज़िंदगी जीकर क्या हासिल किया? आजकल सबसे बड़ा पाप है तो वह यह है कि हम ईमानदारी से जी रहे हैं| आज ईमानदार आदमी के पास क्या है, दस साल पुराना ़िफ्रज, छह साल पुराना बत्तीस इंच का टीवी, एक कार पुरानी या नयी, दो स्कूटर, एक छोटा सा मकान, या नहीं तो एक किराये का मकान| जबकि दुनिया बहुत ही आगे निकल चुकी है| लोगों के पास बहुत सारे पैसे हो गये हैं| पचास इंच का टीवी, एक घर में तीन तीन कारें, हर कमरे में पचास इंच का टीवी, पचास हज़ार के तीन मोबाइल, कम से कम दो करोड़ का मकान, उसके अलावा तीन और मकान| लोग अपने रिश्तेदारों की तरफ़ देखते हैं तो कहते हैं वो लोग कितना आगे निकल गये, हम पीछे ही रह गये|  बहुत सारे लोगों ने अपनी ससुराल से एक भी पैसा नहीं लिया| और ससुराल वाले इस बात की तारीफ़ भी नहीं करते हैं वे कहते हैं कि आप गधे थे जो ससुराल से पैसा नहीं लिया| सभी लोग लेते हैं, आप ईमानदारी में ही मरते रह गये, लोगों ने तो अपने लिए नहीं अपने बच्चों के लिए ससुराल से पैसे लिए और आज वे अपने बच्चो...

महिलाएँ पैसा कमाने का बहुत सारा टेंशन ले रही हैं - EDITOR NEERAJ KUMAR

महिलाएँ पैसा कमाने का बहुत सारा टेंशन अपने पर ले रही हैं जिससे उनकी मौत जवानी में ही हो जा रही है, जबकि पहले मर्द पहले मरते थे और महिलाएँ बहुत जिया करती थीं पैसे के लोभ-हिरस के कारण महिलाओं का जीवन बहुत ही टेंशन से भरपूर हो चुका है, एक केवल पैंतीस साल की महिला ब्यूटीपार्लर का काम सिखाने का काम तीस लड़कियों को सिखाया करती थी| तीस लड़कियों के साथ उसने क्रिसमस की पार्टी मनायी| क्रिसमस के दिन उसने बहुत सारा केक खा लिया| उसे पता था कि उसे शुगर की बीमारी है, और वह शुगर की गोलियों में एक हज़ार रुपया लग रहा है, इसलिए वह गोलियॉं भी नहीं खा रही थी, वह सोच रही थी कि मीठा कम खाऊँगी तो शुगर कंट्रोल में रहेगी| लेकिन केक खाते समय शुगर के बारे में सोचना बंद कर दिया, उसके यह बात ध्यान से ही निकल गयी थी| उस दिन रात में केक खाने से शुगर शूटअप हो गयी और बेहोश होकर गिर गयी| और पॉंच मिनट के भीतर ही उसकी अस्पताल ले जाते समय मौत हो गयी| सो, उस केवल पैंतीस साल की महिला की मौत केवल एक दिन के पार्टी के मनाने और बहुत मीठा खाने से मौत हो गयी|  उसकी चार साल और आठ साल की दो बेटियॉं हैं| अब उनकी ज़िंदगियों का ...

आज के बाद लोगों को विश्‍वास नहीं होगा कि धौनी जैसा चमत्कारिक कप्तान भारत के लिए क्रिकेट खेला था! - EDITOR NEERAJ KUMAR

आज के बाद लोगों को विश्‍वास नहीं होगा कि धौनी जैसा चमत्कारिक कप्तान भारत के लिए क्रिकेट खेला था! औने पौने दे घुमा के, खर्चन खुरचन दे घुमा, जुटा हौसला, बदल फ़ैसला....दे घुमा के घुमा के दे घुमा के... यह गीत २०११ के विश्‍वकप का भक्ति गीत था, और इस गीत को पूरी तरह से दे घुमा देने वाला जुमला, हक़ीक़त में बदलने का जज़्बा धौनी की कप्तानी में ही देखा गया| यह बहुत ही बड़ी जीत एक जीती जागती सच्चाई के रूप में दिखाई दिया| और हम विश्‍वकप जीतकर २०११ के विश्‍वविजेता बने थे| अपने समय के दि ग्रेट फ़िनिशर (मैच बल्लेबाज़ी से  आसानी से ख़त्म कर लेना) और अपने समय के बेहतरीन कप्तान के रूप में उन्हें आँका जाना बेशक हमारे लिए शान रही और दुनिया के लिए मजबूरी भी रही| विश्‍वकप जीतना, २०-२० कप जीतना और चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीतने का आला दर्जे का कप्तानी कीर्तिमान केवल और केवल इन्हीं महाशय को जाता है| एक जादूगर कप्तान और एक अभेद्य बल्लेबाज़ के रूप में एकदिनी मैच में धौनी के भारतीय टीम में आने के पहले और बाद में दो बातें बदल गयीं, उनके टीम में आने के पहले हम सभी भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का ब्लडप्रेशर क्रिकेट मैच देखत...

आज हर इंसानकिसी न किसी बड़े क़र्ज़े या बड़े ख़र्चे में पड़ गया है - EDITOR NEERAJ KUMAR

आज हर दूसरा इंसान या कहिए हरेक इंसान किसी न किसी बड़े क़र्ज़े या बड़े ख़र्चे में पड़ गया है, वहॉं से वह निकल ही नहीं पा रहा है, क़रीब दस से पंद्रह साल उसके उसी में फँस जा रहे हैं जिससे उसका जीना हराम हो गया है टीवी, अख़बार,मोबाइल, दोस्ती, रिश्तेदार इन सब लोगों से आजकल दूर रहकर ही अपनी जान बचायी जा सकती है| टीवी देखते हैं तो बड़े-बड़े बंगले या फ़्लैट ख़रीदने के विज्ञापन दिखाये जाते हैं| हम किसी बिल्डर के पास जाते हैं तो वह कहता है कि हम आपको तीन साल के भीतर एक आलीशान फ़्लैट बनाकर देते हैं फ़्लैट की क़ीमत चालीस लाख रुपया है, आप अभी हमें बीस लाख रुपया दे दीजिए, बाक़ी के बीस लाख फ़्लैट में गृहप्रवेश की पूजा के दिन दे दीजिए| अगर हम बीस लाख रुपये दे देते हैं तो वह बिल्डर हमारा घर तीन साल से भीतर में बनाकर नहीं देता है| वह उसमें पॉंच साल से लेकर आठ साल लगा देता हैं| जबकि बीस लाख रुपया देकर हम फँस जाते हैं| और इंतज़ार में, नया फ़्लैट ख़रीदने के इंतज़ार में हमारी माता मर जाती है, पिता मर जाते हैं, भाई मर जाता है लेकिन वह फ़्लैट बनकर तैयार ही नहीं हो पाता है| और जब हो पाता है, तब तक हमारे बाल सफ़ेद हो जाते हैं, भा...

क्या अपने ही साले, जीजा और बहन की प्रगति नहीं चाहते साले ऐसा क्यों करते हैं?

मेरे से ज़्यादा पैसा मेरे किसी भी रिश्तेदार के पास नहीं होना चाहिए| ऐसी बात आजकल हरेक के मन में हो गयी है| कोई किसी से आगे बढ़ रहा है यह किसी से देखा नहीं जा रहा है| कोई किसी के पास मर जाता है तो यही सोचा जाता है कि अब वो इंसान तो मर गया अब देखते हैं उसका घर कैसे चलता है| फिर उस परिवार की मदद तक नहीं की जाती है, बैठकर सारे लोग तमाशा ही देखते रहते हैं कि वह परिवार कैसे ग़रीबी में पल रहा है, उनकी ग़रीबी देखकर उनको बहुत ही मज़ा आता रहता है|   लोग पहले तो यह चाहते हैं कि मेरे सगे भाई के पास मेरे से पैसा कम होना चाहिए| भाई के बच्चे पैसे पैसे को मोहताज होते रहना चाहिए, जबकि मेरे बच्चे राज करते रहने चाहिए| और जिसके पास पैसा कम हो वह भाई तड़पता रहना चाहिए| ऐसा लोग चाहते हैं फिर जो लोग ऐसा चाहते हैं कि वे लोग भाई की बर्बादी के बाद अपने जीजा या साले की बर्बादी का सोचते हैं| जीजा चाहता है साले के पास पैसा नहीं होना चाहिए और साला चाहता है कि मेरे जीजा के पास पैसा कम से कम होना चाहिए और जीजा साले के टुकड़ों पर पलता रहना चाहिए| यह तो बहुत अजीब बात है कि साला अपनी बहन के घर को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना...

ऐसा लग रहा है कि मोदीजी के हाथ में देश सुरक्षित ही नहीं चरित्रवान बन रहा है

ऐसा लग रहा है कि मोदीजी के हाथ में देश सुरक्षित ही नहीं चरित्रवान बन रहा है, महँगाई कम हो रही है, पेट्रोल के दाम कम होंगे तो बेहतर होगा, ये गांधी,जेपी और लोहिया का देश बनना चाहिए, जहॉं धन नहीं चरित्र ऊँचा होना चाहिए, समाजवादी इसी तरह का देेश चाहते हैं   कुछ गुजरातियों से मैंने पूछा कि हमारे नरेंद्र दामोदर मोदी किस तरह के व्यक्ति हैं? सभी का कहना रहा कि वह वचन के पक्के हैं और उनके कार्य में एक तरह का रहस्य रहता है, वे जो ठान लेते हैं वो करके दिखाते हैं, उन्होंने पहले से हर दूसरा काम जोखिम उठाकर किया है| सो, इस तरह के प्रधानमंत्री को हम सभी ने मिलकर ढाई साल पहले चुना था |  नोटबंदी से देश को बहुत बड़ा अच्छा झटका ये लगा है कि लोगों को भारत का पॉंच हज़ार साल पुराना समय याद आ गया है| लोग कह रहे हैं कि पहले भारत के गॉंवों में ब्राह्मण लोगों की हर बात सुनी-अमल में लायी जाती थी, साथ ही शिक्षक और वैद्य की बात भी गंभीरता से ली जाती थी, और  दूसरी ओर ज़मींदारों का धन से बैभव से राज रहा करता था, पूरा दबदबा रहा करता था| ज़मींदार सभी को दबाकर रखा करते थे और ब्राह्मण लोग जो अच्छे चरित्र...

लोग कहते हैं कि दो बेटे अच्छे होते हैं जबकि दो बेटियॉं ज़्यादा अच्छी होती है

लोग कहते हैं कि दो बेटे अच्छे होते हैं जबकि दो बेटियॉं ज़्यादा अच्छी होती है, दो बेटों की दो बीवियॉं आती हैं तो देवरानी-जेठानी में जीवन भर झगड़ा चलता ही रहता है, एक लव मैरिज की बहू हो तो रोज़ की महाभारत चलती रहती है  पुराने ज़माने में हरेक शादी पंद्रह से बीस साल की उम्र के बीच में ही कर दी जाती थी, बड़े-बूढ़े लोग ही शादी कर देते थे| केवल अपने हिसाब का परिवार देखा जाता था, सुंदरता नहीं देखी जाती थी, लंबा दूल्हा ठिगनी दुल्हन ढूँढी जाती नहीं थी बल्कि, मिलते ही शादी कर दी जाती थी| लड़का-लड़की अलग-अलग छतों से देख लिये जाते थे| शादी पहले से तय कर दी जाती थी| कुछ पसंद-नापसंद की बात होती ही नहीं थी| शादी मिल बॉंटकर कर दी जाती थी, तो दहेज़ देना पड़ता था, सारा जीवन कुछ न कुछ देना ही पड़ता था, लेकिन दोनों परिवार मिलजुल कर रहा करते थे| यह सिलसिला सारी ज़िंदगी चला करता था, लेकिन स्कूल-कॉलेज से लोग लड़के, लड़की को भगा ले जाते थे, दोनों परिवार की बहुत ही बेइज़्ज़ती होती थी, और सारी ज़िंदगी लव मैरिज की मियॉं-बीवी के घर वाले एक दूसरे को बुरी निगाह से देखा करते थे| जब लव मैरिज की मियॉं-बीवी को बच्चा हो जाता ...

हम तो फ़कीर हैं झोला उठाएँगे और चल पड़ेंगे

हम तो फ़कीर हैं झोला उठाएँगे और चल पड़ेंगे  हम तो फ़कीर हैं झोला उठाएँगे और चल पड़ेंगे, मोदीजी की यह बात आज़ादी के परवानों की याद दिल गयी जो अपनी जान की आहुति देकर देश के लिए जान दे दिया करते थे होनी को कौन टाल सकता है| और होनी भी नोटबंदी की ऐसे व्यक्ति से हुई जो हमारे सबसे प्रिय व्यक्ति रहे-नरेंद्र दामोदर मोदीजी से हुई| इससे सबक़ यह सीखना चाहिए कि हमें पैसे का भूखा नहीं होना चाहिए| हर सरकार की ब्यूरोक्रैसी  से बहुत अनबन रही थी, इस नोटबंदी ने ब्यूरोक्रेसी की ताक़त को बहुत हद तक कम कर दिया है| संंासद से लेकर हर छुटभैय्या नेता ने धन बहुत जमा कर लिया था, सारा कुछ चला गया| लोगों ने बहुत ही मेहनत करके पैसा कमाया था, होते-होते वह सफ़ेद धन काला धन हो गया था| अब सारा धन हाथ का मैल होकर रह गया है| ऐसा होगा किसी से नहीं सोचा था, लेकिन अब सोचना यह है कि हमंें तौबा करके भी पैसे से ख़ासकरके नोटों से प्रेम नहीं करना चाहिए| नयी पीढ़ी तो धन की पागल हो गयी थी| उसके लिए धन का लालच नहीं करना उनके जीवन का सबसे बड़ा सबक़ होना चाहिए| ये धन-दौलत कभी भी भारतीय जीवनशैली की नस-नस में बसी हुई नहीं...

विराट कोहली ने चेन्नई टेस्ट की जीत बोनस के रूप में दी है

विराट कोहली ने चेन्नई टेस्ट की जीत बोनस के रूप में दी है विराट कोहली ने चेन्नई टेस्ट की जीत बोनस के रूप में दी है, यानी में तीन जीत पर एक जीत फ्री के रूप में दी है, और इंग्लैंड का दिल बुरी तरह से तोड़ दिया है, यह जीत करुण नायर की तिहरे शतक का तोहफ़ा है जीत का रोमांच अपने चरम पर आ गया जब भारत ने इंग्लैंड की टीम को हवाई जहाज़ में बैठते-बैठते सम भी बहुत गहरा सदमा दिया| उन्हें जाते-जाते पटख़नी दे दी, चेन्नई टेस्ट में हरा दिया| कल से यही ख़यालात आ रहे थे कि बेचारी इंग्लैंड को सुकून से जाने दिया जाये| लेकिन कोहली के इरादे कुछ और थे, और जो हक्ष होना था वह होकर रह गया|  बड़े आराम से ड्रा होने वाला मैच अचानक ऐसा पल्टी खाया कि इंग्लैंड टीम की नानी याद आ गयी और पॉंच दिन का बेफ़िक्र सा लगने वाला सुस्त मैच आधे से एक घंटे के भीतर इंग्लैंड के लिए काल बनकर आया और भारत के लिए स्वर्ग की फुहार बनकर सामने प्रकट हो गया| हर विदेशी टीम भारत की हरेक, चौथे और पॉंचवें दिन की पिचों से घबराते हैं, लेकिन इंग्लैंड को चार बार चौथा और अंतिम दिन सौग़ात के लिए टॉस जीतकर मिल चुका था| लेकिन कोहली की पारियों ने...

अब समय आ गया है कि दूल्हा छोटी उम्र का हो और दुल्हन बड़ी उम्र की हो

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी - 8 अब समय आ गया है कि दूल्हा छोटी उम्र का हो और दुल्हन बड़ी उम्र की हो, तो इससे दो परिवारों का फ़ायदा हो सकता है, बेटी अपने माता-पिता के लिए पैसा जमा करके दे सकती है, या नहीं तो दुल्हन को अपने मायके को, शादी के बाद में लगातार पैसे देने चाहिए, ऐसा क़रार ससुराल के साथ करना चाहिए अब हमारे देश में करोड़ों माता-पिता ऐसे हो गये हैं जिन्हें दोनों ही लड़कियॉं पैदा होती हैं, महँगाई इतनी बढ़ गई है कि तीसरी बार बच्चा पैदा करने की कोशिश ही कोई माता-पिता नहीं कर रहे हैं| दो पर ही पूर्णविराम या फ़ुलस्टॉप लगा दे रहे हैं| पहले क्या था कि बेटी पेट में होती थी तो उसे पेट में ही मार दिया जाता था, क्योंकि बेटी होती थी तो पचास लाख या बीस लाख तो शादी में लगाने ही होते थे| लेकिन अब हरेक बेटी कमाने भी लगी है तो लोग बेटी को पैदा कर भी रहे हैं|

हर शहर में एक तरह का जंगलराज चलता है

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी - 7 हर शहर में एक तरह का जंगलराज भी चलता है,जहॉं पर एक इंसान दूसरे इंसान की जान भी ले लेता है,पैसों के लिए, यहॉं पर दस हज़ार बीस हज़ार से लेकर एक लाख के लिए भी एक-दूसरे की हत्या तक कर दी जाती है यह खेल होता है ब्याज पर पैसे देने का,और यह पैसा बहुत ही ऊँचे ब्याज पर दिया जाता है एक आदमी को शादी के बाद पंद्रह साल तक बच्चा नहीं हुआ| इस पर उसने अपनी सारी कमाई डॉक्टरों पर लगा दी, उसके बाद उसको शादी के सोलह साल के बाद एक बच्ची पैदा हुई| पैदा होने में बहुत तकलीफ़ हो रही थी, तो इलाज में क़रीब चार लाख रुपये लगाने थे, अब उसके पास चार लाख रुपये नहीं थे, एक आदमी ने उसे तीन प्रतिशत ब्याज पर उसे चार लाख रुपये दिये| गिरवी उसने कुछ नहीं रखा| केवल भरोसे पर दिया| भरोसे पर दिया गया पैसा बहुत सारे ब्याज का होता ही है| यानी बारह हज़ार रुपया तो उसका ब्याज ही आ रहा था| अब उस बच्ची के बाप के पास दो ही बातें थीं या तो बच्ची को मरने दूँ या फिर चार लाख रुपये देकर बच्ची को पैदा करूँ| बाप ने सोचा कि बेटी पैदा हो रही है, पैदा होने के बाद भी मेरा सारा जीवन उसको पालने-पोसने और उसकी शाद...

आज भोजन से बढ़कर ख़र्च तो बच्चों की पढ़ाई में आ रहा है

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी - 6  आज भोजन से बढ़कर ख़र्च तो बच्चों की पढ़ाई में आ रहा है, इसलिए अपनी जान बचाने के लिए बच्चों को कम फ़ीस के सरकारी स्कूलों में पढ़ाना बेहद ज़रूरी हो गया है, वरना घर चलना बहुत ही मुश्किल होता चला जा रहा है, बचत तो बहुत दूर की बात है  आज का आम इंसान ही नहीं अमीर इंसान भी मर-मरकर जी रहा है| ग़रीब आदमी को बच्चे की हज़ार रुपय की फ़ीस देना जान पर आ रहा है तो अमीर को अपने बच्चे को डॉॅक्टरी की पढ़ाई में बच्चे पर पचास लाख रुपया देने के लिए दम फूल रहा है| पढ़ाई आज सभी का सिरदर्द बनकर रह गयी है| असल में एक पूरी की पूरी गहरी साज़िश चल रही है कि आपके दोस्त ही आपसे कहते हैं कि बच्चे को महँगे स्कूल में पढ़ाओ नहीं तो बच्चे का जीवन बर्बाद हो सकता है| रिश्तेदार भी यही कह रहे हैं और यही कर रहे हैं| जिससे सभी का जीना बुरी तरह से हराम हो गया है| आज भोजन, पेट्रोल और पढ़ाई में लगभग एक समान का ख़र्च आ रहा है| आज से तीस साल पहले तो लोग अपने बच्चों की पढ़ाई पॉंच रुपया दस रुपया बीस रुपया या बहुत हुआ सौ रुपये महीने की फ़ीस में पूरी हो जाया करती थी| तब दस हज़ार की तनख़...

तीन चार या छह भाई जिस घर में होते हैं उस घर बहुत बदनामी होती है

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी - 5  तीन चार या छह भाई जिस घर में होते हैं उसमें से दो या तीन भाई की बहुत ही बदनामी होती है, बाक़ी का एक भाई हर रिश्तेदार के पास घूम-घूमकर अपने भाईयों की बुराई करके झंडे पर चढ़ा रहता है और बहुत इज़्ज़त पाता है, लेकिन भगवान सभी को न्याय देते हैं, बदनाम भले ही कोई किसी को कर ले तीन या चार या सात भाई किसी घर में होते हैं तो भ एक दो भाई को पैसा कमाने में बहुत कमज़ोर बना देते हैं| लेकिन उनसे शरीर और दिमाग़ की बहुत सारी मेहनत करवा लेते हैं| आजकल घर में उसी भाई की इज़्ज़त होती है जो आजकल के ज़माने में पैसा ज़्यादा कमाने वाला भाई होता है, और वह अपने कमज़ोर भाईयों पर हावी बुरी तरह से हो जाता है| मगर कमज़ोर भाईयों की बीवियॉं बड़ी ही होशियार होती हैं, वह अपने कमज़ोर पतियों को सम्मान दिलाने की पूरी कोशिश करती हैं|गवान ही क्या करते हैं कि दो भाईयों को पैसा कमाने में बहुत ही होशियार बना देते हैं| बाक़ी

रिश्तेदारी को ठीक से निभाना हो तो पैसा नहीं उसका व्यवहार देखना चाहिए

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी रिश्तेदारी को ठीक से निभाना हो तो पैसा नहीं उसका व्यवहार देखना चाहिए और सामने वाले से किसी तरह की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, मगर सच कहा जाय तो ऐसी रिश्तेदारी तो बस दिखावे की रिश्तेदारी हो जाती है, सच में कहॉं गयी वो रिश्तेदारी जिसमें सच्चाई और समर्पण था, और रिश्तेदारों पर पैसा लुटाया जाता था रिश्तेदारी का आजकल पहला उसूल हो गया है कि मैं अपना पैसा किसी को नहीं दूँगा| चाहे कोई भी रिश्तेदार मरता है मर जाय मगर मैं अपना पैसा किसी को नहीं दूँगा| रिश्तेदारी में अगर कोई भी इस तरह से सोचता है तो वह रिश्तेदारी खोखली होती चली जा रही है| पहले क्या था कि देवर, भाभी को साड़ी लाकर देता था| मामा, भानजे को कपड़े लेकर देता था| भाई अपने भाई को त्योहारों पर कपड़े दिया करता था| अब यह चलन पूरी तरह से बंद हो गया है| यह चलन रिश्तेदारों में दोबारा शुरू होना चाहिए| एक रिश्तेदार दूसरे को कपड़े देता है तो रिश्ते में नज़दीकियॉं बढ़ जाती हैं| ऐसा होने से रिश्तेदार एक-दूसरे से मोहब्बत से बात किया करते हैं| नहीं तो किसी भी रिश्तेदार ने दूसरे किसी रिश्तेदार को कपड़े नहीं दिये तो दोनों एक-दू...

आजकल के माता-पिता बहुत ही ईमानदार हैं लेकिन उनके बच्चे ईमानदार नहीं

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी - 3 आजकल के माता-पिता बहुत ही ईमानदार हैं लेकिन उनके बच्चे उतने ईमानदार नहीं, या नहीं तो बच्चे भोले होते हैं क़र्ज़ के चक्कर में पड़ जाते हैं, क़र्ज़ देने वाला बच्चे के पिता से कहता है कि आपके बेटे ने मेरे से क़र्ज़ लिया है तो पिता कहता है उसे मार डालो, क्या ऐसा करना ठीक है  पुराने ज़माने के लोग बहुत ही ईमानदार होते थे, एक पैसे का किसी से क़र्ज़ नहीं लिया करते थे| रूखी रोटी खा लिया करते थे, अचार से खा लिया करते थे, दाल या सब्ज़ी बनाये बिना खा लिया करते थे, लेकिन किसी से क़र्ज़ नहीं लिया करते थे| बहुत ही ईमानदार लोग थे, कई किलोमीटर पैदल चलकर पैसे बचाया करते थे| तीन-तीन बस बदलकर घर आया-जाया करते थे| नौकरी भी बहुत ही ईमानदारी से किया करते थे| रिश्‍वत कभी भी नहीं ली| अपने मालिक के सामने आज्ञाकारी बने रहते थे| एक ही कंपनी में काम करते थे, और वहीं से रिटायर होकर निकला करते थे| हरकोई पहले ईमानदारी की मिसाल हुआ करते थे|

बहू कमाने वाली नहीं गृहिणी लाइये

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी - 2 फिर एक बार समय आ गया है कि अगर आपके पास पैसा अच्छा-ख़ासा है तो घर की बहू कमाने वाली नहीं गृहिणी लाइये, इससे घर में शांति रहेगी और किसी की सेवा करनी हो तो बहू ही काम आती है, बहू को कार चलाना सिखाइये इससे आपके ड्राइवर के दस हज़ार रुपये बच जाएँगे एक परिवार में एक माता-पिता हैं| दो बच्चे हैं| उनके पास एक इंडिपेंडेंट मकान है| जिसकी  क़ीमत साठ लाख रुपये हो चुकी है| उनके पास तीस रुपया भी फ़िक्ट डिपॉज़िट है| परिवार के पिता ने अपने बेटे को एमबीए करवाया है| उस बेटे को तीस हज़ार रुपये की नौकरी मिल चुकी है| उन्होंने जब अपने बेटे के लिए रिश्ता देखा तो साफ़-साफ़ कह दिया कि हमें बहू चाहिए जो घर संभाल ले, वह नौकरी नहीं भी करेगी तो चलेगा| सुंदर और सुशील लड़की चाहिए|

अपने बच्चों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाइये

महानगरों में जीवन से लड़ता आदमी - 1   अपने बच्चों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाइये, लाखों के सपने देखने में मॉं-बाप अपना सारा जीवन बर्बाद कर रहे हैं, मॉं-बाप की कमाई ४० हज़ार है तो बच्चे की ३५ होनी चाहिए, लोग बच्चों के लिए तीस लाख पढ़ाई में डाल रहे हैं  पहले के पुराने लोगों की तनख़्वाह इतनी ज़्यादा नहीं होती थी, १९७० से लेकर १९९० तक लोगों की तनख़्वाह पॉंच सौ रुपये से लेकर बस केवल तीन हज़ार रुपये तक ही हुआ करती थी| और आज ये पुराने लोग महसूस करते हैं कि तभी का जीवन बहुत ही सुंदर हुआ करता था| कमाई कम थी इच्छाएँ तो बहुत ही कम थी लोग स्कूल का ड्रेस पहनकर ही शादियों में चले जाया करते थे| एक ही थान में परिवार के सारे बच्चों के कपड़े सिला दिया करते थे|

विराट कोहली ने पॉंच देशों को लगातार हराया है

विराट कोहली ने पॉंच देशों को लगातार हराया है  और इस बार तो भारतीय टीम के सदस्य बदलने के बाद भी लगातार जीत का सिलसिला जारी रखा है, यह एक सर्वश्रेष्ठ कप्तान की विजय यात्रा का बहुत बड़ा पड़ाव है इसे परीकथा कहिये, या फिर ऐसे परिभाषित कीजिए कि क़िस्मत से विराट कोहली अपने जीवन का श्रेष्ठतम क्रिकेट खेल रहे हैं| इसके पीछे एक पुख़्ता कारण उनका अथाह संयम बल्लेबाज़ी करते समय दिख रहा है| जो गावस्कर, मोहिंदर अमरनाथ और लक्ष्मण की याद दिलाता है| ऍाफ़ स्टंप के दस इंच बाहर की गेंद से उन्हें परहेज़ है, लेकिन कभी-कभार वे उस गेंद को भी खेल जाते हैं| अंग्रेज़ी बल्लेबाज़ों की तरह वे हुक और पुल शॉट खेल जाते हैं जिससे कि भारतीय बल्लेबाज़ समय-समय पर खेलने से आनाकानी किया करते थे| फ़िलहाल वे अपने बहुत अच्छे समय से गुज़र रहे हैं| उनका कप्तानी के रूप में तुरुप का इक्का अश्‍विन रहे हैं| और वो न चलें तो सर जडेजा, जयंत में लगातार बदलाव करते रहते हैं| भारतीय कप्तान विराट कोहली के रूप में क्रिकेट की एक नयी बौछार आयी है, एक बेहद ख़ुशनुमा और माहौल को महकाने वाला अति उत्तम क्षेत्ररक्षक, कप्तान, बल्लेबाज़ आया है जो उन...

आम आदमी तो चार चीज़ों से प्रताड़ित है- महँगाई, स्कुल की फ़ीस

आम आदमी तो चार चीज़ों से प्रताड़ित है-महँगाई, स्कूल-कॉलेज की फीस , पेट्रोल के दाम, इलाज पर ख़र्च, इससे भी मोदीजी निजात दिला दें तो हम उनका उपकार मानेंगे   नोटबंदी के बाद अब, आज़ादी के सत्तर साल के बाद ऐसा पहली बार लग रहा है कि हम आज़ाद भारत में सॉंस ले रहे हैं| लाईन में खड़े होकर हमने भी देश के लिए कुछ कर दिखाया है, ऐसा लग रहा है,  जैसे एक महायुद्ध होने के बाद जनता कैसे अपने नये देश को बनाने में लग जाती है, उसी तरह की अनुभूति हो रही है| बैंकों में क़रीब दस लाख करोड़ जमा होने के बाद ऐसा लग रहा है कि हमने अपने लिए कुछ पैसा हासिल कर लिया है|  पहली बार ऐसा लग रहा है कि ग़रीबों के लिए मुफ़्त में घर बनेगा, ग़रीबों को दो वक़्त की सम्मान की रोटी मिलेगी| मेरा भारतवासी ग़रीब, जो ग़रीब आजकल विदेशी बैंकों की फुटपाथ पर सोता था, उस ग़रीब को  पुलिस उसे वहॉं से हटने तक लगातार डंडे मारा करती थी, उस तरह के दिल दहला देने वाले दृश्य ग़रीबों को लेकर अब देखने को नहीं मिलेंगे, और ईश्‍वर से प्रार्थना है कि वैसे ग़रीबों के लिए दृश्य अब मोदीजी हमें न दिखाएँ तो उनका लाख-लाख शुक्र...

Labels

Show more