मोदीजी के साथ मिलकर हम नया भारत बनाएँ

मोदीजी के साथ मिलकर हम नया भारत बनाएँ



भारत की आम जनता आजकल सरकार से डरकर जी रही है। सरकार को डराना भी चाहिए। सरकार हमारी माईबाप बन गयी है। एक रक्षक बन गयी है, एक पिता बन गयी है। पिता जिस तरह से बच्चों को उनके भले के लिए डराकर रखता है सरकार उसी तरह से जनता को डराकर रख रही है, हमने १९८० के बाद के पैदा हुए बच्चों को डराया नहीं बल्कि उनको लाड़-प्यार इतना सारा दे दिया कि अब वही बच्चे माता-पिता को डरा धमकाकर जी रहे हैं, बच्चे ही माता-पिता का सारा पैसा व्यापार में लुटा रहे हैं। इसलिए किसी के भले के लिए डराने वाला बहुत ज़रूरी होता है। सो, इस बिगड़े हुए देश में एक अनुशासित सरकार का होना बहुत ही ज़रूरी हो गया है। पहले उडती हुई ख़बर आयी है कि दस-दस के सिक्के बंद हो रहे हैं, तो लोगों ने दस दस के सिक्के बैंकों में डालना शुरू कर दिये। अब ख़बर आ रही है कि दो हज़ार के नोट बंद हो रहे हैं, इसलिए उन नोटों को लोग जल्दी-जल्दी बैंक में डाल रहे हैं। मोदीजी ने धन संचय पूरी तरह से बंद करने की कसम खा ली है, जो बहुत ही अच्छी बात है। ग़रीब देश में दो हज़ार का नोट चलेगा तो देश में अपने आप भ्रष्टाचार चलता रहेगा। एक ग़रीब आदमी महीने में एक ही बार दो हज़ार का नोट देख पाता है, जब उसकी तनख्वाह मिलती है। केवल गिनती के दो हज़ार के पचास नोट का ही दो हज़ार का एक बंडल एक लाख रुपया हो जाता है इस हिसाब से एक सूटकेस में आराम से एक करोड़ से दो करोड़ से लेकर पाँच दस करोड़ रुपया भी रखा जा सकता है। भ्रष्टाचार के सूटकेस कांड तो आपने सुने ही होंगे, नेता सुखराम के घर से सूटकेस के नोट मिले थे। पिछले बीस दिन में तीन किस्से सुनने को मिले, तिरुपति में बालाजी के मंदिर में किसी ने २५ करोड़ के नोट गुल्लक में डाल दिये। एक व्यक्ति ने १.४ करोड़ का घपला बैंक में किया है। और एक और व्यक्ति ने बैंक के ११.५ करोड़ रुपये का घपला किया है। यह रकम कुछ लोगों को बहुत ही छोटी दिख सकती है, लेकिन मेरे जैसे इंसान का तो इससे सात जन्मों का जीवन चल सकता है, एक करोड़ रुपया मुझे दे दीजिए, मैं पूरे एक जीवन में १२ लाख रुपये के ब्याज यानी आठ हज़ार रुपये के प्रतिमाह बैंक से लेकर आऊँगा और घर चला लूगा। ब्याज पर महीने भर घर चला सकता हूँ। ब्याज पर एक पूरा जीवन जीकर बतला सकता हूँ। मेरा हिसाब आठ हज़ार का इस तरह से है-दो हज़ार का किराये का घर, स्कूल की सरकारी फीस, दो बच्चों की, और भोजन के तीन हज़ार। मैं एक रुपया किलो चावल लेकर खाऊँगा, पहले भी करोड़ों लोगों ने एनटीआर के दो रुपये किलो के चाव खाये हैं तब हमने २ रुपया सत्तर पैसे किलो के चावल खाये हैं। घूमने के लिए सरकारी बस या फिर तीन या चार किलोमीटर पैदल चलकर आराम से बहुत अच्छा जीवन गुजार सकता हूँ। एक रेडियो दे दीजिए जिस में पुराने फिल्मी गीत दिन भर आते रहे तो बहुत ही मज़े से ज़िंदगी गुजर सकती है। मुझे ऐसे DDD DDDS uuDB D aLCLmD BuDuDD DDB BGD uDu DuD D mD D DuuDuDCDD DBDDB BGGLSD DuuDB BD D DBa BDS DDBaBD D DBDaaDBD D DD DBuuu Du DuuDaGaaB D LDLDDuDuDS DBaaL uDSDD DuDD DuDLu D DD D DD DD uD D DGGS BDD D DuD D DD DD Du D DuSDD D DD DSuuD BDB LLLB BDBD DuD DDLLDDDD D DDD D DB D DaDaDaS मैं आज भी दावे के साथ कह सकता हूँ कि देश के साठ करोड़ लोग आठ हज़ार महीने की कमाई से घर चला सकते हैं। गाँव में ज़मीनें बहुत ही सस्ती चल रही हैं वहाँ पर वे दो से तीन लाख में आप अपना दो कमरे का मकान बना सकते हैं। मेरे यहाँ के वॉचमैन का दो कमरे का मकान गाँव में है, वह वहाँ मज़े लेने महीने में चार दिन जाकर आता है, उसकी ज़िंदगी मज़े से गुजर रही है, केवल हम ही पचास लाख के मकान के लिए एक करोड़ के मकान के लिए हम अपना सारा जीवन लगा दिया करते हैं। उसी चक्कर में पड़कर रात दिन काम किया करते हैं, शरीर को बीमारियों का घर बना लिया करते हैं। गरीब तो, वे मस्त रहते हैं, पैसा बचते ही कहीं तीर्थ यात्रा पर चले जाया करते हैं। जितना तीर्थ यात्रा पर गरीब आदमी जाता है, उतना अमीर नहीं जाता है। गरीब लोग परिवार के साथ ही मंदिर में ही सो जाते हैं या मंदिर के पास के फुटपाथ पर सो जाया करते हैं। आप कहेंगे कि यह तो कीड़े-मकोड़ों का जीवन है, नहीं, बिल्कुल नहीं, बिल्कुल नहीं, यह पूरी तरह से ईमानदारी का जीवन है, ईश्वर का दिया हुआ जीवन। जिसमें हमें शर्म भी नहीं करनी चाहिए। आप भगवानों का जीवन ही देख लीजिए भगवान राम को १४ साल के वनवास में फूल-पत्ते खाकर जीवन गुजारना पड़ा, उनको अनाज भी नहीं मिला, न ही किटी पार्टियों में वे जाते थे, न किसी गेट टूगेदर रावण के साथ मनाते थे, उनको आगरा होटल का गाजर का हलवा नहीं मिला वनवास में, आगरा होटल की केसर पिस्ता लस्सी तो नहीं मिलीन, एस. जी. कमफर्ट होटल का लंच तो नहीं मिलान, उनको गोविंद का डोसा, गोकुल चाट की मिर्चियाँ, बालाजी रतनलाल की मिठाई, ताजमहल के मील्स, चार हज़ार की थाली कहाँ से मिलती थी, बेचारे रामचंद्रजी भी आराम से जिये चौदह साल के वनवास में, सुदामा भी जिये, केवट भी जिये, शबरी भी जी पायी। बिना ऐशो आराम का जीवन जीकर भगवाम राममर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये, उनके पास नहीं था, लैंको हिल्स में फ्लैट, अंबानी जैसा घर नहीं था, मुसद्दीलाल जैसे ३६ कारें उनके घर में नहीं थी। सो, जो प्रभु ने दिया उसमें जी लेना चाहिए। हम कहते हैं कि एक आदमी एक करोड़ का घपला बैंक में करता है तो वह भारत के छह परिवारों का हक़ छीन लेता है, उनकी जीवन भर की कमाई को खुद ही हड़प लेता है। एक दूसरा घपला मैंने ऊपर लिखा कि ११ करोड़ रुपये का हुआ है। बापरे, ग्यारह करोड़ का घपला यानी आप भारत के क़रीब साठ लोगों का हक़ छीनकर बैठ चुके हैं। उसी तरह पच्चीस करोड़ रुपये किसी ने तिरुपति की हुंडी में डाले, यानी उससे भी १२५ भारतीयों का जीवन बन सकता है। मोदीजी का रवैया ठीक है कि जितना भ्रष्टाचार कम होगा, देश उतना ही सुख से जियेगा। अब सरकार ने जीएसटी की जाँच पड़ताल शुरू तो नहीं की है, लेकिन वे समय दे रहे हैं व्यापारियों को कि वे संभल जाएँ, सभी लोग संभल गये हैं, सभी लोग अपनी कमाई का एकाउंट रख रहे हैं, यह बहुत ही अच्छी देश की स्थिति चल रही है। अब समय आ गया है कि हम अपनी जिंदगी को सरकार के हिसाब से ही ढाल लें, चार चार घर न ख़रीदें, दस दस ज़मीनें न ख़रीदें, आपने जाकर कभी मोदीजी की माता जी के घर का साइज देखा है, उनके भाई का घर देखा है, मोदीजी जो पूरी तरह से ठन ठन गोपाल रहकर देश चला रहे हैं, वे सारे एक आम आदमी की तरह ही जीवन जी रहे हैं। आम आदमी बनना दुख की बात नहीं है, बल्कि सुख की बात है कि हम तो भारत की उस जनता का हिस्सा हो रहे हैं या हैं जो कि करोड़ लोग उसी तरह से जीवन जी रहे हैं। हमने ही कुछ करतूतें ख़राब कर ली हैं, अमीर लोगों के चरणदास हो गये हैं, उनके जैसा बनना चाहते हैं, लेकिन उनका बरसों बाद कोई घोटाला निकलता है तो हम ही सहम जाते हैं कि किस बदनाम आदमी के हम चरण छू रहे थे। पुराने लोग सही कहा करते थे कि अमीर आदमी कई लाशों पर से चलकर अमीर बनता है, कईयों का हक़ छीनकर अमीर बनता है, कई ग़रीबों का फंड छीनकर अमीर बनता है, पुराने लोगों को अपनी ग़रीबी पर बहुत गर्व हुआ करता था, वे रामचरितमानस के नीतिपरक दोहे पढ़कर ही जीवन जिया करते थे। हमारी ही करतूतें गंदी हो गयी थीं, हम उनको ही नमस्ते करते चले जा रहे थे जो भ्रष्टाचार या भाई बहन या माता पिता का हक़ छीनकर या उनका हक़ पूरा नहीं करके धन कमा रहे थे। हम उनको दुत्कार रहे थे जो बहुत ही स्वाभिमान से जी रहे थे। भारत का सौभाग्य है कि मोदीजी ने रामराज्य की स्थापना करने की कोशिश तो की है। लोगों का विचार बहुत तेज़ी से बदल रहा है, कि अब हमें भ्रष्टाचार को त्यागना ही होगा। नोटबंदी से सारा कच्चा चिट्ठा सामने आ गया है। इस समय आपको एक विकल्प तो मिला है कि नहीं हम महँगी दवा नहीं लेंगे, बाबा रामदेव की दवा लेकर जी सकते हैं। आज बाबा रामदेव की दवाओं को आप सस्ते में ख़रीद सकते हैं, हर चौराहे पर उनकी दुकानें खुल गयी हैं, एक जवान आदमी आगे जाकर बाबा रामदेव की दवाएँ खाकर एक स्वस्थ जीवन जीने की गारंटी तो ले सकता है। इस समय हम आप जो ४० पार साल के हो गये हैं वे तो शुगर बीपी हार्ट बवासीर माइग्रेन साइनस घुटने के दर्द, किडनी ख़राब करके, सड़ सड़कर जी रहे हैं। मगर रामदेव की दवाईयों को लेकर नयी पीढ़ी इन सब भयंकर बीमारियों से बचकर जी तो सकती है। रामदेव की आँख में डालने वाली दवा डालिये, कभी चश्मा नहीं लगेगा, कम से कम बाबा के भोजन में सड़ा हुआ या केमिकल कुछ भी नहीं है। बाबा रामदेव ने हालाँकि पहले शहर शहर जाकर धन्नासेठों से एक करोड़ से पाँच करोड़ लिया, लेकिन बाद में जाकर आज वे इमोशनल ब्लैकमेल करके भी लोगों को आज दवाइयों की बहुत ही ईमानदार दुनिया में तो लेकर गये हैं। सो, भारत की जनता को अब पूरी तरह से एक अलग ही तरह का जीवन जीने का रवैया बनाना होगा। शहर की ओर भागने के बजायगाँव जाकर जीवन जीना चाहिए। क्योंकि गाँव में भी इंटरनेट आ रहा है, सबकुछ गाँव में ही हासिल हो रहा है। गाँवों में भी बंगले बन चुके हैं। वहाँ भी सुपर मार्केट आ गये हैं, तो शहर का आकर्षण पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। हैदराबाद में तो इतना बुरा हाल है कि फुटपाथ जैसी चीज़ ही समाप्त हो गयी है, दिन में सड़क पर चलने की जगह भी नहीं बची है, हर मशहूर शहर का यही हाल हो चुका है। मोदीजी पूरे देश का हाल बदल रहे हैं, ग़रीब हिम्मत से जिये ऐसा माहौल बना रहे हैं। इस समय हर ग़रीब मेहनत से जी रहा है, लेकिन मेहनत करने को तैयार तो हो गया है, उन्हें लग रहा है कि यह देश बदल रहा है। पूरी तरह से बदल रहा है। अब यह दंगों का देश नहीं रहा, जहाँ लाखों हज़ारों लोग मर जाया करते थे, अब यहाँ रात में किसी जाति के लोग किसी जाति के परिवारों को रातोंरात पूरी तरह से आग में जलाकर नहीं जाते, अब आतंकवादी हमले नहीं के बराबर हो रहे हैं, मुसलमान बहुत ही सुरक्षित महसूस कर रहा है। और क्या चाहिए, तो फिर मैं पक्का समझें न मोदीजी के हम गोद लिये सुपुत्र बन गये हैं।

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