कन्हैया कुमार की बातों को कितना लागू कर रहे हैं मोदीजी

क्या कन्हैया कुमार में किसी तरह से बड़ा राजनीतिज्ञ बनने की चिंगारी है, इधर हमें मोहन भागवत की बातों पर भी ध्यान देना होगा जिस तरह से मुसलमान राजनीतिज्ञ जैसे असदुद्दीन-अकबरुद्दीन बंधु आक्रामक तरीके से बात करते हैं तो हिंदू जनता उसको हँसते-हँसते बदश्त कर लेती है कि ये नादान हैं। लेकिन हिंदूवादी संगठन जब कमल हासन को कुछ कहते हैं तो वो उसे बहुत ही गंभीरता से ले लेते हैं। और सारे देश में हल्ला मचा देते हैं कि मेरी जान को ख़तरा है। यह तो उनको बोलने के पहले समझना चाहिए था कि महाभारत के बारे में जो उन्होंने कहा था क्या वो हिंदुओं को चोंट करेगा या नहीं। मैं संपादक के रूप में इस बात का पक्षधर नहीं हूँकि मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदुओं के खिलाफ़ कुछ कहा जाये या हिंदुओं को खुश करने के लिए मुसलमानों के लिए कुछ कहा जाये, आज तो देखिये दोनों समुदाय चैन की बंसी बजा रहे हैं। ये हिंदू पार्टी और मुस्लिम पार्टी होती क्या है, इसे समझने के लिए जावेद अख्तर की बात याद आती है, एक बार जावेद अख्तर से पूछा गया कि ये हिंदू संगठन और मुस्लिम संगठन क्या होते हैं, तो जावेद अख्तर ने कहा कि कांग्रेस ने जब मुसलमानों को बहुत आज़ादी दे दी, उधम मचाने के लिए तो लाज़िमी था कि हिंदू भी संगठित होकर अपनी आवाज़ उठाते। और जावेदजी ने साफ़ कर दिया कि शिवसेना-मनसे सहजता से नहीं बल्कि मुसलमानों से मुकाबले करने के लिए बनी हैं और जितना उधम मुसलमानों के संगठन मचाएँगे हिंदू संगठनों को भी ऑटोमेटिक ज़बरदस्त माइलेज मिलेगा। मतलब ये कि एक भड़केगा तो दूसरा भी, एक शांति से रहेगा तो दूसरा भी शांति से रहेगा। आज संघ के लोग सत्ता में हैं, फिर भी संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत बहुत ही मीठी वाणी में बिना किसी ललकार के लहज़े में कह रहे हैं कि हिंदू यानी सभी भारतीय, यानी भारत की सारी जनता, और सभी के साथ समान बर्ताव हम करेंगे। इसका सीधा-सीधा अर्थ हो रहा है कि इसमें सभी अल्पसंख्यकों को भी न्याय मिलेगा। अब हुआ यह है कि ऊँची वाणी में मुसलमान सामने आकर कह रहे हैं कि हम मोदीजी के राज में सुरक्षित हैं, डर रहे हैं लेकिन देखते-देखते हमारे चार साल सुरक्षित रूप से गुजर चुके हैं। मतलब ये कि सभी चैन की बंसी बजा रहे हैं। पिछले बीस साल के शांति और सुरक्षा के इन चार साल के स्वर्ण युग में कन्हैया कुमार हिंदूवादी भारत से ख़फ़ा चल रहे हैं। देखिये बात दरअसल यह है कि डराने-धमकाने की राजनीति तो ओवैसी भी करते रहे, लाल दरवाज़ा को हरा दरवाज़ा बना देंगे, ऐसी-ऐसी अफ़वाहें भी उडीं। अकबरुद्दीन ने तो कुछ ही मिनटों में सारी हिंदू जाति का सफ़ाया करने की भी बात कहीं थी, अब एक हिंदू संगठन की ख़बर छपती है कि कुछ तत्वों को गोली से भून दिया जाना चाहिए तो इस बात को उसी तरह से लिया जाना चाहिए, जिस तरह से कि अकबरुद्दीनजी की बातों को लिया था हिंदुओं ने। हैदराबाद के विधायक राजा सिंहजी पर जेल में जब हमला हुआ था, तो उनका बच निकलना बहुत ही दिल को सुखदायी रहा। क्योंकि राजा सिंह हिंदुओं के लिए रोज़गार दिलाने का भी काम कर रहे हैं और शराब की दुकान हटाने का भी काम कर रहे हैं। हम हो या आप हो, सभी यही चाहते हैं कि अकबर-राजा पहले देश की ग़रीबी पर काम करें, लोगों को शिक्षित करें तो देश का भला होगा, और राजा सिंहजी यह काम कर रहे हैं। उधर अकबरुहीन का हत्या से बच जाना कितना सार्थक रहेगा यह उनके अच्छे काम देखकर लोग कहेंगे। सो, दोनों तरफ से यह सब चलता रहेगा तो ठीक रहेगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि संगठन पार्टियाँ कुछ भी कहें हमारे जो ख़ैरख्वाह मोदीजी हैं वे दिल्ली में बैठकर बहुत ही समझदारी से देश को चला रहे हैं इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए। सो, फिलहाल तो कन्हैया कुमारजी को हिंदुओं के प्रति अशुभ नहीं कहना चाहिए। तब तक जब तक कि देश में शांति क़ायम है। कन्हैया कुमार एक और बात कहते हैं वे ब्राह्मणवाद के वर्चस्व का मसला उठाते हैं कि देश का वर्ग ब्राह्मणवाद से दुखी है, वे कहते हैं कि नाला साफ़ करता है एससीएसटीबीसी और पुजारी बनते हैं ब्राह्मण। लेकिन अब तो हालात बदल गये हैं अब तो एससीएसटी भी ऊँचे पदों पर आरूढ़ हो चुके हैं और ब्राह्मण लोग उनसे कम पदों पर काम कर रहे होंगे। या कर रहे हैं। या इसी बात को आप अलग तरह से बतला सकते हैं कि ब्राह्मणों ने विदेशों में नौकरी शुरू कर दी, कहीं ऊँची छलांग लगा दी, या फिर एससीएसटी ने भी ऊँची छलांग लगा दी, यह अब खुला जगत हो गया है, अगर आप भारत के महानगरों में आते हैं तो यहाँ पर छुआछूत और मतभेद अब कम हो गया है, या नहीं के बराबर है, क्योंकि काम ही इतना ज़्यादा हो गया है कि मरने तक की फुर्सत नहीं है, एक बार मुंबई में बॉम ब्लास्ट हुआ तो सारा मुंबई हिल गया, लेकिन अगले ही दिन लोकल ट्रेन में पहले जितनी ही खचाखच भीड़ थी, तब सारी भीड़ ने कहा कि मुंबई का वर्क-कल्चर यानी यहाँ की कार्य-संस्कृति इतनी भयावह, बेहद अनुशासित और डिमांडिंग है कि यहाँ एक दिन भी छुट्टी लो तो जीवन में नौकरी चले जाने का बम ब्लास्ट हो जाता है, इसलिए लोग यहाँ मरमरकर काम करते हैं। सो, जातिवाद अब जाता रहा और काम का बोझ इतना है कि लोग जातियों को भूलकर काम में घुसे, दबे, कुचले, मरते रहते हैं। सो, हो सकता है कि कन्हैया कुमार गाँव में होने वाले ब्राह्मणवाद की ओर इशारा कर रहे हैं, वहाँ भी यह समाप्त हो जायेगा क्योंकि मोदीजी पाँच साल में हरेक गाँव को अल्ट्रा मॉर्डन शहर बना डालेंगे। इधर ब्राह्मण लोग अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण कॉरपोरेट जगत में वे करोड़ों में खेल रहे हैं, क्रिकेट में भी मनीष पांडे आ गये हैं, सिनेमा में भी विशाल भारद्वाज आ गये हैं, पांडे लोग क्रिकेट में आये यह किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। मारवाड़ी लोग इवेन्ट मैनेजर बन गये हैं, वे कोरियोग्राफ़ी का भी काम करके लाखों कमा रहे हैं, कोरियोग्राफ़र जवानों को काला चश्मा जाँचता DS DuDuDuuDuD D DD uuD DuDB DBDD D DD DD D DD DD D DD D DDuD DD DD DBBD D DD DD BuDuDB u DBDBDD D DD DD BuDu D DaaDD DD DuuDu DauDuB aDuDu uDuDuSDDD DD D DD DD झूम झूमकर नाचकर उसे वॉट्स पर अपने यार दोस्तों को दिखला रहे हैं। अच्छा यह सौभाग्य ही कहिए कि हर भाषायी लोगों में ऊँची और नीची जाति के लोग है जैसे मराठी, तेलुगु, तमिल, कन्नड़ सभी में। और हर स्तर पर यह संघर्ष चलता रहा है। एक बात मैं बताता चलूकि 1992 में मैं जब एम.ए. पास करके निकला था, तो तब सभी सरकारी नौकरियों में एससीएसटीबीसी ड्राइव चल रहा था, हर सरकारी नौकरी का विज्ञापन सारी सीटें एससीएसटीबीसी को आरक्षित होती थीं, सो, मेरे जैसे जनरल कोटे वालों को एक भी नौकरी नहीं थी, पाँच साल तक भूखे शेर की तरह मैं नौकरी तलाश कर रहा था, आबिद रोड पर हर शाम जाकर जीपीओ के सामने नौकरी के आवेदन के फॉर्म ख़रीदा करता था, और रो रहा था कि मैं जनरल कोटे में पैदा क्यों हुआ, काश, मैं भी आरक्षित कोटे में होता। लेकिन आज मैं बेहद खुश हूँकि मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिली, सारी सरकारी नौकरी में एक ही कुसों, एक ही पद पर आप कैसे चालीस साल गुजार सकते हैं, कैसे ट्रांसफर होने पर बोरियाबिस्तर बार-बार उठाकर मारे-मारे फिरते और बेचारे सरकारी अधिकारियों के साथ यही अन्याय होता रहा। 1990 में जाकर तो स्थिति और भी भयंकर हो गयी, आधे से ज्यादा सरकारी नौकर अकेले अलग-अलग शहरों में जीवन गुजारने लगे, पत्नी अलग शहर में, बच्चों के स्कूल के शहर में पत्नी तो पति कहीं और सरकारी नौकरी बजाता फिर रहा है। सो, जिनको रेवडियाँ मिली उसमें भी दुनिया भर के ख़तरे थे। कई सरकारी लोग तो अकेले-अकेले रातोंरात हार्टअटैक खाकर मर गये। क्योंकि तब ज़बान के नीचे रखने वाली सारबीट्रेट गोली देने वाली पत्नी अपने बच्चों के साथ दूसरे शहर में थी। बेचारा पति अगले कमरे से सॉरबीट्रेट लेकर खाता तब तक उसकी साँसें ही रुक गयीं। मगर कईयों के अंत में उनके भी दिन फिरे फिर अंत में जाकर रिटायरमेंट के बाद बेचारे तीन फ्लैट ख़रीदकर आज चैन का जीवन जी रहे हैं। इत्मिनाना आया भी तो तब जब पेट में आँत नहीं और मुँह में दाँत नहीं, और प्रेम करने के लायक़ शरीर नहीं। स्वर्णिम वैवाहिक जीवन की उम्र दूसरे शहरों में भटक-भटककर समाप्त हो गयी। हिंदी वालों का मद्रास ट्रांसफर हुआ तो उनको भाषा DD DDDD DDD DDDS DDD DBDD DDDDD DDD DDD DDD D DDD D DDDD DDD DD DDD DD DDD DDD D DDDD DDDDD DDD DDD SDDD DD D DD DDD DDS DDDD बेहद सुखद नहीं था, लेकिन कुछ हद तक क्या बहुत हद तक दुखद ज़रूर था। क्योंकि डबल बेड का आधा हिस्सा ख़ाली था। पति का भी पत्नी का भी। मैं दाद देता हूँ जनरल कोटा वालों को कि उन्होंने बिना देरी किये सरकारी नौकरी से मुकाबला करने के लिए व्यापार में मेहनत की, बाज़ारवाद आया, कॉरपोरेट जगत आया तो जनरल कोटा वालों ने उस पर हाथ आज़माया, अब तो सरकारी नौकरियों का यह हाल हो गया है कि यहाँ पर प्रोबेशन पीरियेड के बाद पहले दो साल तक कट-कटाकर पच्चीस हज़ार रुपया दिया जा रहा है, तो कोई भी सरकारी नौकरी करने से पहले दोबारा सोच रहा है, क्योंकि अब तो ऊपर वाले की दया से अब एससीएसटीबीसी के लोग भी इतने संपन्न हो गये हैं कि वे भी सोच रहे हैं कि सरकारी नौकरी में पच्चीस हज़ार कमाने से अच्छा है चालीस हज़ार में कॉरपोरेट जगत में काम कर लो, नोटबंदी के पहले तो हालात यह हो गये थे कि नौकरी ख़ाली पड़ी थी लोग करने को तैयार नहीं हो रहे थे। मगर हालात अब बदल रहे हैं, कन्हैया कुमार के भाषण अब बेअसर हो रहे हैं, उनकी सभा में आधे से अधिक साठ की उम्र के लोग टाइमपास करने आ रहे हैं, कि चलो आज कन्हैया कुमार का भाषण सुनेंगे। कन्हैया कुमार असरदार हैं लेकिन उससे भी कहीं असरदार मोदीजी हैं, मोदीजी इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं कि उनके मुकाबले में कोई नहीं ठहर पा रहा है। मोदीजी आगे बढ़ो हम आपके साथ हैं।

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